पारधी जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Pardhi Tribe in Hindi

इस पोस्ट में पारधी (शिकारी) जनजाति (Pardhi Tribe in Hindi) के बारे में, उनके इतिहास, रहन-सहन, उपजातियों के अनूठे कार्य, कृषि, रीति-रिवाज, त्योहार एवं देवी-देवताओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी गई है।

Pardhi Tribe Overview (पारधी जनजाति एक नजर में)
जनजाति का नाम पारधी (शिकारी) जनजाति
शाब्दिक अर्थ मराठी शब्द 'पारध' से बना, जिसका अर्थ है 'आखेट' या शिकार।
प्रमुख उपजातियां बहेलिया, टाकनकर, फांस पारधी, लंगोटी पारधी, चीता पारधी और गोसाईं पारधी।
निवास स्थान मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर, रायगढ़, सरगुजा, बिलासपुर, और रायपुर संभाग के जिले।
भाषा एवं बोली पारधी (भीली समूह), छत्तीसगढ़ी और हिंदी।
पारंपरिक कार्य वन्यजीवों का शिकार (विशेषकर पक्षी) और छींद शिल्प।

पारधी जनजाति (Pardhi Janjati) – पारधी समुदाय मध्य भारत की एक पारंपरिक शिकारी जनजाति है। इनका नाम मराठी शब्द "पारध" से प्रेरित है, जिसका अर्थ शिकार होता है। छत्तीसगढ़ में यह जनजाति अपनी विशिष्ट आखेट कला और वनों से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती है। ऐतिहासिक रूप से इन्हें ब्रिटिश काल में 'आपराधिक जनजाति' घोषित किया गया था, लेकिन वर्तमान में ये एक सम्मानित अनुसूचित जनजाति के रूप में समाज की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।

इतिहास एवं उपजातियों का विशिष्ट कार्य

पारधी समाज कई उपजातियों में बंटा हुआ है, जिनमें से प्रत्येक का शिकार करने का अपना अलग तरीका और पहचान रही है:

  • बहेलिया पारधी: ये मुख्य रूप से पक्षियों का शिकार करने में निपुण होते हैं।
  • टाकनकर: इनका पारंपरिक कार्य पत्थर की चक्की को टांकना (उसमें छेद करना/सुधारना) रहा है।
  • फांस पारधी: ये जाल या फांस बिछाकर जंगली जानवरों को पकड़ते हैं।
  • चीता पारधी: ये प्राचीन काल में चीतों को पालने और प्रशिक्षित करने का कार्य करते थे।
  • लंगोटी पारधी: इनकी पहचान केवल लंगोटी धारण करने के कारण हुई है।

पारंपरिक व्यवसाय एवं शिल्प कला (Traditional Occupation)

आधुनिक कानूनों और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के कारण अब इस जनजाति ने शिकार का त्याग कर दिया है। वर्तमान में इनकी अर्थव्यवस्था निम्नलिखित पर टिकी है:

  • छींद शिल्प: पारधी जनजाति के लोग छींद के पत्तों से अत्यंत सुंदर झाड़ू, चटाई और टोकरियाँ बनाने में माहिर होते हैं। छत्तीसगढ़ में पारधी झाड़ू बहुत प्रसिद्ध हैं।
  • कृषि एवं मजदूरी: अब ये स्थायी रूप से बसकर धान, मक्का और कोदो-कुटकी की खेती करते हैं।
  • वनोपज संग्रहण: जड़ी-बूटियाँ, महुआ और तेंदूपत्ता इकट्ठा करना इनकी आजीविका का मुख्य हिस्सा है।

रहन-सहन और खान-पान (Lifestyle & Food)

आवास: इनके घर कच्चे, मिट्टी की दीवारों और खपरैल की छतों वाले होते हैं। ये अक्सर जंगलों के समीप छोटी बस्तियों में रहना पसंद करते हैं।

खान-पान: पारधी समाज का मुख्य भोजन चावल, मक्का और दालें हैं। ये लोग मांसाहारी होते हैं और पारंपरिक रूप से वन के छोटे जीवों व पक्षियों का शिकार करते थे। महुआ से बनी शराब (सीर) का प्रयोग इनके सामाजिक उत्सवों में अनिवार्य माना जाता है।

देवी-देवता एवं धार्मिक आस्था

पारधी जनजाति मुख्य रूप से देवी पूजक है। ये शक्ति की उपासना करते हैं। इनके प्रमुख धार्मिक तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • चांदी की मूर्ति: लंगोटी पारधी परिवार विशेष रूप से अपनी कुलदेवी की चांदी की मूर्ति की पूजा करते हैं, जिसे वे अत्यंत पवित्र मानते हैं।
  • प्रकृति पूजा: ये वृक्षों, नदियों और वन देवताओं की पूजा करते हैं ताकि शिकार और खेती में सफलता मिले।
  • त्योहार: ये नवाखाई, दीपावली, होली और दशहरा जैसे प्रमुख त्योहारों को जनजातीय रीति-रिवाजों के साथ मनाते हैं।

पारधी जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)

प्रश्न: पारधी शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: 'पारधी' शब्द मराठी के 'पारध' से बना है, जिसका अर्थ है शिकार करना या आखेट करना।
प्रश्न: पारधी जनजाति मुख्य रूप से किस वस्तु का निर्माण करती है?
उत्तर: ये जनजाति मुख्य रूप से छींद के पत्तों से झाड़ू और चटाई बनाने के शिल्प कार्य के लिए जानी जाती है।
प्रश्न: ब्रिटिश शासनकाल में इस जनजाति की सामाजिक स्थिति क्या थी?
उत्तर: ब्रिटिश सरकार ने इन्हें 'आपराधिक जनजाति' (Criminal Tribes Act) की सूची में रखा था, जो आजादी के बाद समाप्त कर दिया गया।
प्रश्न: पारधी जनजाति की प्रमुख उपजातियां कौन सी हैं?
उत्तर: बहेलिया, टाकनकर, फांस पारधी और लंगोटी पारधी इनकी प्रमुख उपजातियां हैं।
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