परधान जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Pardhan Tribe in Hindi
इस पोस्ट में परधान जनजाति (Pardhan Tribe in Hindi) के बारे में, उनके इतिहास, रहन-सहन, संस्कृति, भाषा एवं बोली, विवाह प्रथा, पारंपरिक वाद्य यंत्र (किंगरी), त्योहार और गोंड समाज में उनके विशेष स्थान के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी गई है।
| Pardhan Tribe Overview (परधान जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | परधान जनजाति (Pardhan Tribe) |
| सामाजिक पहचान | गोंड जनजाति के पारंपरिक मंत्री (Minister) और गाथा-गायक (Bard)। |
| प्रमुख उपजातियां | राज परधान, गाड़ा परधान और पोथिया परधान। |
| प्रमुख गोत्र (टोटम) | मरकाम, सिरशाम, धुर्वे, श्याम, परतेती, उइके और मरावी। |
| निवास स्थान | मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ (कबीरधाम, मुंगेली, राजनांदगांव, बिलासपुर), मध्य प्रदेश (मंडला, डिंडोरी) और महाराष्ट्र। |
| भाषा एवं बोली | गोंडी (द्रविड़ भाषा परिवार), छत्तीसगढ़ी और हिंदी। |
| प्रमुख वाद्य यंत्र | 'किंगरी' (Kingri) या 'बना' (Bana) |
परधान जनजाति (Pardhan Janjati) - परधान जनजाति भारत के मध्य भाग में निवास करने वाली एक अत्यंत कला-प्रेमी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जनजाति है। यह मूलतः गोंड जनजाति की ही एक उपशाखा है। प्राचीन गोंडवाना साम्राज्य में परधानों का स्थान अत्यंत उच्च और सम्मानजनक था। ये गोंड राजाओं के मंत्री (Minister), सलाहकार, और वंशावली गाने वाले चारण या भाट (Bards) हुआ करते थे। गोंड इतिहास और किंवदंतियों को गीतों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का पूरा श्रेय परधान जनजाति को ही जाता है।
परधान जनजाति का इतिहास एवं उत्पत्ति (History & Origin)
परधान जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में एक बहुत ही रोचक और प्रसिद्ध दंतकथा (Myth) प्रचलित है:
प्राचीन काल में सात आदिवासी भाई थे (गोंड, बैगा, अगरिया आदि)। एक दिन सातों भाई मिलकर 'बूढ़ादेव' की पूजा करने गए। पूजा के बाद छह भाई अपनी झोपड़ियों में लौट गए, लेकिन सबसे छोटा भाई वहीं रुक गया। उसने बांस के टुकड़े और घोड़े के बालों से एक वाद्य यंत्र बनाया जिसे 'किंगरी' या 'बना' कहा गया। वह किंगरी बजाते हुए बूढ़ादेव की स्तुति में मधुर गीत गाने लगा।
उसकी लयबद्ध स्वर-लहरी से प्रसन्न होकर बूढ़ादेव प्रकट हुए और उसे आशीर्वाद दिया कि, "तुम संगीत और पूजा कार्य में निपुण रहोगे और बाकी भाई (गोंड) तुम्हारा भरण-पोषण करेंगे।" माना जाता है कि इसी सबसे छोटे भाई के वंशज आज 'परधान' कहलाते हैं। गोंड समाज आज भी परधानों को अपना पुरोहित और कथावाचक मानता है और फसल कटने पर इन्हें सम्मान स्वरूप अनाज (धान) देता है।
भाषा एवं बोली (Language)
चूंकि ये गोंडों के ही पुरोहित हैं, इसलिए इनकी मूल भाषा 'गोंडी' है, जो द्रविड़ भाषा परिवार का हिस्सा है। इसके अलावा, अपने गीतों और गाथाओं को व्यापक लोगों तक पहुँचाने के लिए ये स्थानीय 'छत्तीसगढ़ी' और 'हिंदी' भाषा का भी उत्कृष्ट प्रयोग करते हैं। (नोट: इनकी भाषा भोजपुरी या नागपुरी नहीं है)।
पारंपरिक वाद्य यंत्र और लोकगीत (Traditional Instrument & Folk Songs)
परधान जनजाति का पूरा जीवन संगीत को समर्पित है। इनकी सबसे बड़ी पहचान इनका पारंपरिक वाद्य यंत्र है:
- किंगरी (Kingri) / बना (Bana): यह तीन तारों वाला एक वाद्य यंत्र है जो वायलिन या सारंगी की तरह दिखता है। इसे बजाकर ही परधान लोग गोंड राजाओं की वंशावली, बूढ़ादेव की स्तुति, और लोककथाएं (जैसे लिंगो पेन की गाथा) गाते हैं।
- लोककथाएं: इनकी गाथाओं में रामायण, महाभारत, गोंडवाना का इतिहास, और आल्हा-ऊदल की कथाएं भी शामिल होती हैं, जिन्हें ये अपनी शैली में प्रस्तुत करते हैं।
रहन-सहन, खान-पान और पहनावा (Lifestyle & Food Habits)
आवास: परधान लोग गोंडों के साथ ही गांवों में निवास करते हैं। इनके घर मिट्टी और लकड़ी के बने होते हैं, जिन्हें ये बहुत साफ-सुथरा रखते हैं।
खान-पान: इनका मुख्य भोजन मक्का, ज्वार की रोटी, कोदो-कुटकी का भात, उड़द की दाल और मौसमी भाजियां हैं। ये लोग मांसाहारी भी होते हैं और विशेष त्योहारों या उत्सवों पर महुआ से बनी पारंपरिक शराब का सेवन अनिवार्य मानते हैं।
पहनावा एवं आभूषण: पुरुष पारंपरिक रूप से धोती, कुरता, बंडी और साफा (पगड़ी) पहनते हैं। महिलाएं 'लुगरा' और पोलका पहनती हैं। परधान महिलाएं गोदना (Tattoo) गुदवाने की बहुत शौकीन होती हैं और गले में हंसली, हाथ में गुलेटा तथा पैरों में पैरी और तोड़ा (चांदी/गिलट के आभूषण) पहनती हैं。
कृषि एवं अर्थव्यवस्था (Agriculture & Economy)
प्राचीन काल में इनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से गोंड जमींदारों द्वारा दिए गए दान (अनाज/पशु) पर निर्भर थी, जिसे 'मांग-खासी' कहा जाता था। परंतु आधुनिक समय में जमींदारी प्रथा समाप्त होने के कारण, अब परधान जनजाति के अधिकांश लोगों ने कृषि (खेती) और कृषि मजदूरी को अपना लिया है। ये कोदो, कुटकी, धान, उड़द और तिल की खेती करते हैं। इसके अलावा वनोपज (महुआ, तेंदूपत्ता) इकट्ठा करना भी इनकी आजीविका का हिस्सा है।
देवी-देवता एवं त्योहार (Deities & Festivals)
परधान जनजाति के सर्वप्रमुख देवता 'बूढ़ादेव' (Bada Dev) हैं। बूढ़ादेव का निवास 'साजा' (Saja) के वृक्ष में माना जाता है।
इसके अलावा ये नारायण देव, दुल्हा देव, ठाकुर देव, शीतला माता, और बाघदेव की भी पूजा करते हैं। त्योहारों के रूप में ये नवाखानी, दशहरा, दीपावली, होली, और हरेली पर्व अत्यंत उत्साह से मनाते हैं। पूजा में नारियल, मुर्गा या बकरे की बलि देने की प्रथा भी है।
विवाह संस्कार (Wedding Ceremony)
परधान समाज में समगोत्रीय (एक ही गोत्र में) विवाह पूर्णतः वर्जित है। ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों (Cross-cousin) के बीच विवाह को इस समाज में अत्यंत शुभ और श्रेष्ठ (दूध लौटावा) माना जाता है।
समाज में आयोजित विवाह (तय करके की गई शादी) प्रमुख है, जिसमें वधूमूल्य (Suk) देने की प्रथा है। इसके अलावा लमसेना (सेवा विवाह), उढ़रिया (भागकर शादी), गुरावट (विनिमय) और विधवा पुनर्विवाह (चूड़ी पहनाना) को भी समाज की पारंपरिक पंचायत द्वारा मान्यता प्राप्त है।
परधान जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: गोंड जनजाति का पारंपरिक मंत्री और कथावाचक (गाथा-गायक) किसे माना जाता है?
- उत्तर: परधान जनजाति को। ये गोंड राजाओं के मंत्री और उनकी वंशावली गाने वाले चारण (Bards) होते थे।
- प्रश्न: परधान जनजाति का सबसे प्रमुख पारंपरिक वाद्य यंत्र कौन सा है?
- उत्तर: 'किंगरी' (Kingri) जिसे 'बना' भी कहा जाता है। यह तीन तारों वाला एक वाद्य यंत्र है।
- प्रश्न: परधान जनजाति के सर्वोच्च देवता कौन हैं?
- उत्तर: 'बूढ़ादेव'। इनकी स्तुति में ही किंगरी वाद्य यंत्र बजाया जाता है।
- प्रश्न: परधान जनजाति छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से कहाँ निवास करती है?
- उत्तर: मुख्य रूप से कबीरधाम (कवर्धा), मुंगेली, राजनांदगांव और बिलासपुर जिलों के सीमावर्ती क्षेत्रों में।