ओझा जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Ojha Tribe in Hindi
इस पोस्ट में ओझा (गोंड) जनजाति (Ojha Gond Tribe in Hindi) के बारे में विस्तृत और प्रामाणिक जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, रहन-सहन, संस्कृति, भाषा, विवाह प्रथा, गोत्र व्यवस्था, पारंपरिक वाद्य यंत्र (डहकी), गोदना शिल्प (Tattoo Art), और उनके प्रमुख देवी-देवताओं का गहराई से वर्णन किया गया है।
| Ojha (Gond) Tribe Overview (ओझा जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | ओझा जनजाति (Ojha Tribe) |
| मूल जनजाति | यह गोंड जनजाति की ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपशाखा है। |
| सामाजिक पहचान | गोंडों के गाथा-गायक (Bards), शकुन-विचारक (Diviners), और गोदना शिल्पी (Tattoo Artists)। |
| प्रमुख गोत्र (देव व्यवस्था) | इनके गोत्र देवों की संख्या (4, 5, 6, 7 देव) पर आधारित होते हैं। प्रमुख गोत्र: मर्सकोला, कुमरा, परते, मरावी, भलावी, मरकाम, इवनाती, सिरसाम और उइके। |
| निवास स्थान | मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ (सूरजपुर, जशपुर, बस्तर, राजनांदगांव, धमतरी, रायगढ़), मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र। |
| भाषा एवं बोली | गोंडी (द्रविड़ भाषा परिवार), छत्तीसगढ़ी और हिंदी। |
| प्रमुख वाद्य यंत्र | 'डहकी' या 'ढुंकु' (Dahki / Dhunku) |
ओझा (गोंड) जनजाति (Ojha Gond Janjati) - ओझा जनजाति भारत के मध्य भाग में निवास करने वाली गोंड जनजाति की एक कला-प्रेमी और आध्यात्मिक उपशाखा है। 'ओझा' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही 'शकुन विचारने वाला' या 'तांत्रिक' (Soothsayer / Shaman) होता है। प्राचीन काल से ही ओझा समाज गोंडों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा रहा है। जहां ओझा पुरुष पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाकर गोंड राजाओं और देवताओं की गाथाएं गाते हैं, वहीं ओझा महिलाएं पूरे मध्य भारत में अपनी अद्भुत 'गोदना' (Tattooing) कला के लिए प्रसिद्ध हैं।
इतिहास एवं उत्पत्ति की पौराणिक कथा (History & Origin Myth)
ओझा जनजाति की उत्पत्ति के संबंध में गोंड समाज में 'बूढ़ादेव' और 'लिंगो पेन' से जुड़ी एक बहुत ही प्रसिद्ध दंतकथा (Myth) प्रचलित है:
मान्यता है कि भगवान महादेव (बूढ़ादेव) ने जब मानव (मनखे) की रचना की, तो उन्होंने तीन भाई बनाए। महादेव ने बड़े भाई को खेती-बाड़ी का काम सौंपा, जो 'गोंड' कहलाया। मंझले भाई को पूजा-पाठ और मंत्री का काम सौंपा, जो 'परधान' कहलाया। और सबसे छोटे भाई को महादेव ने एक विशेष वाद्य यंत्र 'डहकी' (Dahki) देकर गीत और संगीत का ज्ञान दिया, जो 'ओझा' कहलाया।
महादेव के आशीर्वाद के कारण ही ओझा लोग अन्य जनजातियों (विशेषकर गोंडों) के घर जाकर डहकी बजाकर महादेव और लिंगो पेन के गीत गाते हैं। इसके बदले में गोंड समाज उन्हें सम्मानपूर्वक भिक्षा (अनाज और दान) देता है। इस पारंपरिक भिक्षाटन को आदिवासी संस्कृति में 'मांगतिरी' (Mangtiri) कहा जाता है।
पारंपरिक व्यवसाय एवं अद्वितीय कलाएं (Traditional Occupations)
ओझा जनजाति की पूरी अर्थव्यवस्था और सामाजिक पहचान उनके पारंपरिक और कलात्मक कार्यों पर निर्भर है:
- गोदना कला (Tattoo Art): ओझा महिलाएं पारंपरिक रूप से गोदना गोदने का कार्य करती हैं। आदिवासी समाज में गोदना को केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि एक ऐसा शाश्वत आभूषण माना जाता है जो मृत्यु के बाद भी आत्मा के साथ जाता है। ओझा महिलाएं सुई और प्राकृतिक स्याही (कालिख और जड़ी-बूटियों) से अत्यंत जटिल और सुंदर आकृतियां उकेरने में निपुण होती हैं।
- गाथा गायन (Bards): ओझा पुरुष गोंडों के घरों में जाकर 'डहकी' वाद्य यंत्र बजाते हैं। यह एक प्रकार का छोटा नगाड़ा या डमरू जैसा वाद्य होता है। इसे बजाकर वे गोंड वंशावली और देवताओं की स्तुति करते हैं।
- झाड़-फूंक और शकुन विचार: ओझा समाज जड़ी-बूटियों और तंत्र-मंत्र (Shamanism) का गहरा ज्ञान रखता है। ये लोग गांव में बीमारियों का इलाज और शकुन विचारने का काम भी करते हैं।
आधुनिक कृषि एवं अर्थव्यवस्था (Agriculture)
चूंकि आधुनिक समय में पारंपरिक भिक्षाटन और गाथा-गायन से आय कम हो गई है, इसलिए अब ओझा जनजाति ने भी मुख्य रूप से कृषि (खेती) को अपना लिया है।
ये लोग पारंपरिक उपकरणों (हल, हंसिया, खुरपी) का उपयोग करते हुए धान, कोदो-कुटकी, मक्का, उड़द और चना उगाते हैं। कुछ क्षेत्रों में ये 'झूम' (स्थानांतरित) कृषि का भी अभ्यास करते थे, लेकिन अब स्थायी कृषि करते हैं। इसके अलावा वनोपज (महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी) इकट्ठा करना भी इनकी आजीविका का मुख्य साधन है।
रहन-सहन और खान-पान (Lifestyle & Food)
आवास एवं वेशभूषा: ओझा लोग गोंडों के गांवों में ही अपनी अलग बस्ती बनाकर रहते हैं। इनके घर मिट्टी और खपरैल के बने होते हैं जिन्हें बहुत साफ-सुथरा रखा जाता है। पुरुष पारंपरिक रूप से धोती, बंडी (कुर्ता) और साफा पहनते हैं। महिलाएं रंग-बिरंगी साड़ियां (लुगरा) और पोलका पहनती हैं। ओझा महिलाएं स्वयं भी भारी गोदना गुदवाती हैं और गिलट, पीतल व कौड़ियों से बने आभूषण (हंसली, करधन, पैरी, खिनवा) पहनती हैं।
खान-पान: इनका मुख्य भोजन चावल, मक्का, कोदो की पेज, और स्थानीय भाजियां हैं। ये लोग मांसाहारी भी होते हैं (मछली, मुर्गा, शिकार किया हुआ मांस)। महुआ से बनी शराब और चावल की हड़िया का सेवन उत्सवों और धार्मिक अनुष्ठानों पर अनिवार्य रूप से किया जाता है।
देवी-देवता एवं धार्मिक आस्था (Deities of Ojha Tribe)
ओझा समाज का धार्मिक जीवन पूरी तरह से प्रकृति और जीववाद पर आधारित है। गोंडों की उपशाखा होने के कारण इनके देवी-देवता भी गोंडों के समान ही होते हैं:
- बड़ादेव (बूढ़ादेव) / सिंगबोंगा: ये इनके सर्वोच्च देवता हैं, जिनका निवास 'साजा' के पेड़ में माना जाता है।
- भीमसेन और बाघदेव: गांव को वन्य जीवों से बचाने और शक्ति के प्रतीक के रूप में भीमसेन और बाघदेव की पूजा की जाती है।
- ग्राम देवियां: दंतेश्वरी माता, जोगनी माता, बूढ़ी माई, और शीतला माता की पूजा गांव को महामारियों से बचाने के लिए की जाती है।
- मुदुआ और डोंगरदेव: पहाड़ों और जंगलों के रक्षक देवता।
त्योहार एवं लोकनृत्य (Festivals & Folk Dances)
प्रमुख त्योहार: ओझा समाज कृषि चक्र पर आधारित त्योहार मनाता है। इनमें बिदरी (बीज बोने का त्योहार), पोला, नवाखानी, हरेली, दशहरा, दीपावली, महाशिवरात्रि और फाग (होली) प्रमुख हैं। 'मड़ई' (Madai) मेलों में इनकी सक्रिय भागीदारी होती है।
लोकनृत्य एवं गीत: उत्सवों के समय ये लोग ढोल और नगाड़े की थाप पर पारंपरिक 'करमा नृत्य', 'शैला' और 'सुआ नृत्य' करते हैं। विवाह के समय बिहाव गीत और फाल्गुन में फाग गीत गाए जाते हैं।
विवाह संस्कार (Wedding Ceremony)
ओझा समाज में गोत्र (Dev System) का बहुत महत्व है। एक ही 'देव' संख्या (समगोत्रीय) वाले परिवारों में विवाह वर्जित है।
- दूध लौटावा (Cross-cousin Marriage): इनमें मामा और बुआ की संतानों के बीच विवाह को सबसे अधिक प्राथमिकता दी जाती है। इसे समाज में बहुत शुभ माना जाता है।
- वधूमूल्य (Suk): विवाह तय होने पर वर पक्ष द्वारा वधू के पिता को सम्मान स्वरूप अनाज, दाल, तेल, हल्दी, 'लुगरा' (कपड़े), महुआ की शराब (मंद) और कुछ नकद राशि दी जाती है। इसे 'सुक' या 'खर्चा' कहा जाता है।
- विवाह की रस्में: विवाह की पारंपरिक रस्में समाज के पुजारी (जिसे 'भूमका' या 'बैगा' कहा जाता है) द्वारा संपन्न कराई जाती हैं। इसके अलावा लमसेना (सेवा विवाह), उढ़रिया (भागकर शादी), और विधवा पुनर्विवाह को भी पूर्ण मान्यता प्राप्त है।
ओझा (गोंड) जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से कौन सी जनजाति पारंपरिक रूप से 'गोदना' (Tattooing) गोदने का कार्य करती है?
- उत्तर: ओझा जनजाति की महिलाएं। आदिवासी समाज में ये सबसे कुशल गोदना शिल्पी मानी जाती हैं।
- प्रश्न: ओझा पुरुष गाथा गायन के समय किस पारंपरिक वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं?
- उत्तर: 'डहकी' (Dahki)। यह ओझा समाज का सबसे प्रमुख पारंपरिक वाद्य यंत्र है जो महादेव द्वारा दिया गया माना जाता है।
- प्रश्न: ओझा जनजाति की उत्पत्ति किस मूल जनजाति से मानी जाती है?
- उत्तर: यह गोंड जनजाति की ही एक महत्वपूर्ण उपशाखा है।
- प्रश्न: ओझा समाज में विवाह की पारंपरिक रस्में कौन संपन्न कराता है?
- उत्तर: ओझा समाज में धार्मिक और वैवाहिक रस्में मुख्य रूप से 'भूमका' (Bhumka) नामक पारंपरिक पुजारी द्वारा संपन्न कराई जाती हैं।