भारिया जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Bharia Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की अत्यंत रहस्यमयी और विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) 'भारिया' (Bharia Tribe in Hindi) के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, 'पातालकोट' (Patalkot) के भौगोलिक रहस्य, जड़ी-बूटियों के अगाध ज्ञान (भुमका), प्रसिद्ध 'भड़म नृत्य', संकटकालीन भोजन (आम की गुठली की रोटी), युवागृह (धंगरबासा), और देवी-देवताओं का गहराई से वर्णन किया गया है।
| Bharia Tribe Overview (भारिया जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | भारिया जनजाति (Bharia / Bharia-Bhumia Tribe) |
| संवैधानिक दर्जा | भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) (मुख्यतः मध्य प्रदेश में)। |
| शाब्दिक अर्थ | 'भार' ढोने वाला (कठिन परिश्रम करने वाला) या 'भूमि का रक्षक' (भूमिया)। |
| प्रमुख भौगोलिक पहचान | छिंदवाड़ा जिले की 3000 फीट गहरी और रहस्यमयी 'पातालकोट' (Patalkot) घाटी के मूल निवासी। |
| निवास स्थान | मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (छिंदवाड़ा, जबलपुर, मंडला) और छत्तीसगढ़ के सीमांत जिले (बिलासपुर, सरगुजा, जांजगीर-चांपा)। |
| भाषा एवं बोली | भरियाटी (Bhariati) (जिस पर द्रविड़ और मुंडा भाषा का प्रभाव है), बुंदेली और हिंदी। |
| युवागृह का नाम | धंगरबासा / रंगभंग (Dhangarbasa) |
| प्रमुख लोकनृत्य | भड़म (Bhadam), सैतम, अहिराई और करमा। |
भारिया जनजाति (Bharia Janjati) - भारिया भारत की उन अत्यंत दुर्लभ और संरक्षित जनजातियों में से एक है, जिसने सदियों तक खुद को बाहरी दुनिया और आधुनिक सभ्यता से पूरी तरह अलग रखा। ये मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती जिलों में निवास करते हैं। इनकी अत्यंत आदिम जीवनशैली, शिक्षा के भारी अभाव और दुर्गम निवास स्थान के कारण भारत सरकार ने इन्हें 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) की सूची में रखा है। यह जनजाति जड़ी-बूटियों (Herbal Medicine) के अगाध ज्ञान और अपने जादुई लोकनृत्यों के लिए पूरे देश में जानी जाती है।
इतिहास एवं पातालकोट का रहस्य (History & Patalkot Valley)
भारिया जनजाति का इतिहास गोंडों से बहुत करीब से जुड़ा हुआ है। मानवशास्त्रियों के अनुसार, भारिया स्वयं को गोंडों का छोटा भाई मानते हैं और गोंडों को अपना 'अग्रज' सम्मान देते हैं।
- पातालकोट (Patalkot) का भूगोल: भारिया जनजाति का सबसे प्रमुख, पवित्र और रहस्यमयी निवास स्थान मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले (तामिया ब्लॉक) में स्थित 'पातालकोट' है। यह घोड़े की नाल (Horseshoe) के आकार की एक विशाल घाटी है, जो लगभग 1200 से 3000 फीट तक गहरी है। इस घाटी के बीच से 'दूधी' नदी बहती है जो इनके जीवन का मुख्य आधार है।
- अंधेरी और कटी हुई दुनिया: यह घाटी इतनी गहरी और घने वनों से घिरी है कि इसके कई हिस्सों में सूरज की रोशनी दोपहर में ही पहुंच पाती है और शाम बहुत जल्दी ढल जाती है। सदियों तक इस घाटी में रहने वाले भारिया लोगों का घाटी के बाहर की दुनिया से कोई संपर्क नहीं था।
- नामकरण की मान्यताएं: एक पौराणिक मान्यता के अनुसार, कौरव-पांडवों के युद्ध में या रामायण काल में भार ढोने के कारण इनका नाम 'भारिया' पड़ा। एक अन्य मत है कि गढ़ा-मंडला के 'भर' राजाओं के वंशज होने के कारण इन्हें भारिया कहा गया। ये स्वयं को 'भूमिया' (भूमि का रक्षक) कहलाना अधिक पसंद करते हैं।
जड़ी-बूटियों का ज्ञान और 'भुमका' (Herbal Expertise & Bhumka)
भारिया जनजाति का प्राकृतिक चिकित्सा और वनस्पतियों का ज्ञान इतना गहरा है कि देश-विदेश के वनस्पति वैज्ञानिक (Botanists) भी यहां शोध करने आते हैं:
- भुमका और परिहार (Traditional Healers): पातालकोट और आसपास के जंगलों में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों की इन्हें अचूक पहचान होती है। भारिया समाज के पारंपरिक वैद्य और पुजारी को 'भुमका' (Bhumka) कहा जाता है। भुमका सर्पदंश (सांप का काटना), गठिया, अस्थमा, बुखार और कई असाध्य रोगों का इलाज केवल जंगली पत्तियों, छालों और जड़ों से कर देते हैं।
- वनोपज: आजीविका के लिए ये लोग जंगलों से महुआ, चिरौंजी, हर्रा, बहेड़ा और शहद इकट्ठा करते हैं। साथ ही बांस और 'छिंद' के पत्तों से बेहतरीन झाड़ू और टोकरियां बनाकर हाट-बाजारों में बेचते हैं।
कृषि, रहन-सहन और संकटकालीन खान-पान (Lifestyle & Food)
कृषि और ढाना: भारिया बस्तियों (गांवों) को 'ढाना' (Dhana) कहा जाता है। पूर्व में ये लोग जंगलों को जलाकर 'दहिया' (Dahia) नामक स्थानांतरित (Shifting) कृषि करते थे। पर्यावरण संरक्षण कानूनों के कारण अब इन्होंने पहाड़ों की ढलानों पर सीढ़ीनुमा और स्थायी खेती अपना ली है। ये मुख्य रूप से मक्का, कोदो, कुटकी, और ज्वार उगाते हैं।
अनोखा खान-पान: इनका मुख्य दैनिक भोजन मक्का और ज्वार की 'पेज' (Page - एक प्रकार का सूप) है।
- आम की गुठली की रोटी: पातालकोट के भारियाओं की यह सबसे अनूठी विशेषता है। बारिश या अकाल के दिनों में जब अनाज समाप्त हो जाता है, तब ये आम की गुठलियों (Mango Kernels) को इकट्ठा कर, उसे राख और बहते पानी में कई दिनों तक धोते हैं ताकि उसका जहरीलापन दूर हो जाए। फिर उसे पीसकर आटा बनाते हैं और उसकी रोटियां सेंककर खाते हैं।
- महुआ की शराब (सीर) और ताड़ी का सेवन इनके समाज में बहुत आम है और इसके बिना इनका कोई भी धार्मिक या सामाजिक उत्सव पूरा नहीं होता।
प्रमुख लोकनृत्य: 'भड़म' और 'सैतम' (Folk Dances)
भारिया जनजाति के लोकनृत्य अत्यंत आकर्षक, लयबद्ध और शारीरिक स्टैमिना (Stamina) की परीक्षा लेने वाले होते हैं:
- भड़म नृत्य (Bhadam Dance): यह भारिया जनजाति का सबसे प्रसिद्ध और ऊर्जावान पुरुष प्रधान नृत्य है। यह विवाह के अवसर पर किया जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर यह तथ्य पूछा जाता है कि 'भड़म नृत्य' मध्य भारत का सबसे लंबे समय तक चलने वाला नृत्य माना जाता है। इसमें नर्तक ढोल और टिमकी की थाप पर रात से शुरू करके सुबह तक बिना रुके नृत्य करते हैं।
- सैतम (Saitam): यह महिलाओं का एक अत्यंत सुंदर और सुरीला नृत्य है जो ढोलक की थाप पर वृत्ताकार रूप में किया जाता है।
- अहिराई: विवाह के समय किया जाने वाला एक अन्य पारंपरिक नृत्य है।
युवागृह और विवाह संस्कार (Youth Dormitory & Marriage)
धंगरबासा (युवागृह): आदिवासी संस्कृति और मूल्यों को सहेजने के लिए भारिया समाज में भी 'युवागृह' की परंपरा पाई जाती है, जिसे 'धंगरबासा' (Dhangarbasa) या 'रंगभंग' कहा जाता है। गांव के अविवाहित युवक-युवतियां यहां रात में इकट्ठा होते हैं और अपने समाज के रीति-रिवाजों, लोकगीतों, नृत्यों और सामाजिक अनुशासन की शिक्षा ग्रहण करते हैं।
विवाह संस्कार: भारिया समाज में समगोत्रीय (एक ही गोत्र में) विवाह पूर्णतः वर्जित है। इनके गोत्र प्रकृति और जीवों पर आधारित होते हैं (जैसे- भुल्या, अंगारिया, ठक्कर)।
- दूध-लौटावा (Cross-cousin Marriage): गोंडों की भांति इनमें भी मामा और बुआ की संतानों के बीच विवाह को समाज में सबसे अधिक श्रेष्ठ और शुभ माना जाता है।
- लमसेना (सेवा विवाह): यदि वर पक्ष 'वधूमूल्य' चुकाने में असमर्थ होता है, तो लड़का अपने होने वाले ससुर के घर जाकर 1 से 3 साल तक मजदूरी करता है। लड़की के पिता के प्रसन्न होने पर विवाह संपन्न होता है। इसे 'लमसेना' कहते हैं।
- विवाह की रस्में गांव के 'भुमका' (पुजारी) द्वारा संपन्न कराई जाती हैं। इसके अलावा राजी-बाजी (प्रेम विवाह) और विधवा पुनर्विवाह को भी मान्यता प्राप्त है।
देवी-देवता एवं धार्मिक आस्था (Deities & Religion)
भारिया जनजाति पूर्णतः प्रकृति पूजक और जीववादी है। ये झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र में भी गहरा विश्वास रखते हैं:
- बूढ़ादेव (बड़ा देव) और दूल्हा देव: ये इनके सबसे प्रमुख और आराध्य देवता हैं। बूढ़ादेव की पूजा गांव की रक्षा के लिए (साजा वृक्ष के नीचे) और दूल्हा देव की पूजा परिवार की सुख-शांति व बीमारियों से बचाव के लिए की जाती है।
- मुठवा बाबा और नागदेव: कृषि की रक्षा, अच्छी बारिश और जंगली जानवरों (विशेषकर सांपों) से बचाव के लिए इनकी पूजा होती है।
- त्योहार: भारिया समाज बिदरी (बीज बोने का त्योहार), जावरा, नवाखाई (नया अन्न खाना), दीपावली, होली (फाग) और हरेली जैसे त्योहार अत्यंत धूमधाम से मनाता है।
भारिया जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: भारिया जनजाति का सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी निवास स्थान कहाँ स्थित है?
- उत्तर: मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले (तामिया ब्लॉक) में स्थित घोड़े की नाल के आकार की 3000 फीट गहरी 'पातालकोट' (Patalkot) घाटी को भारिया जनजाति का सबसे रहस्यमयी और मूल निवास स्थान माना जाता है।
- प्रश्न: भारिया जनजाति का वह कौन सा नृत्य है जो मध्य भारत में सबसे लंबे समय तक चलने वाले नृत्य के रूप में जाना जाता है?
- उत्तर: 'भड़म नृत्य' (Bhadam Dance)। यह पुरुषों द्वारा विवाह के समय किया जाने वाला अत्यंत ऊर्जावान नृत्य है जो बिना रुके पूरी रात चलता है।
- प्रश्न: भारिया जनजाति के पारंपरिक वैद्य या पुजारी को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: इनके पारंपरिक वैद्य, जो जड़ी-बूटियों और तंत्र-मंत्र के विशेषज्ञ होते हैं, उन्हें 'भुमका' (Bhumka) या 'परिहार' कहा जाता है।
- प्रश्न: अकाल या भोजन की भारी कमी के समय पातालकोट के भारिया लोग मुख्य रूप से क्या खाते हैं?
- उत्तर: अकाल के समय ये लोग 'आम की गुठली की रोटी' बनाकर खाते हैं। गुठली के कड़वेपन और जहर को निकालने के लिए इसे राख में उबालकर और बहते पानी में धोया जाता है।
- प्रश्न: भारिया जनजाति के 'युवागृह' और गांव को स्थानीय भाषा में क्या कहते हैं?
- उत्तर: इनके पारंपरिक युवागृह को 'धंगरबासा' (Dhangarbasa) या 'रंगभंग' और इनके गांवों (बस्तियों) को 'ढाना' (Dhana) कहा जाता है।