कोल जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Kol Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मध्य भारत की अत्यंत प्राचीन और रामायण काल से जुड़ी कोल जनजाति (Kol Tribe in Hindi) के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके पौराणिक इतिहास, पारंपरिक पंचायत 'गोहिया', उनके प्रसिद्ध 'कोल दहका' नृत्य, कृषि, रहन-सहन, उपजातियों और देवी-देवताओं का गहराई से वर्णन किया गया है।
| Kol Tribe Overview (कोल जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | कोल जनजाति (Kol Tribe) |
| पौराणिक पहचान | रामायण और महाभारत काल से उल्लेखित प्राचीन जनजाति (माता शबरी से संबंध की मान्यता)। |
| प्रमुख उपजातियां | रौतिया (Rautia) और रौतेले (Thakuria), भिल, भवरगिया, दशोरा आदि। |
| निवास स्थान | मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (रीवा, सतना, सीधी, शहडोल) और छत्तीसगढ़ (कोरिया, सूरजपुर, सरगुजा, बलरामपुर)। |
| पारंपरिक पंचायत | गोहिया (Gohiya) या मय्यारी (प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण)। |
| भाषा एवं बोली | कोलही (मुंडा/ऑस्ट्रिक भाषा परिवार), बघेली, छत्तीसगढ़ी और हिंदी। |
| प्रमुख लोकनृत्य | कोल दहका (Kol Dahka) नृत्य। |
कोल जनजाति (Kol Janjati) - कोल भारत की सबसे प्राचीन और विशाल जनजातियों में से एक है। यह मूल रूप से 'मुंडा' (ऑस्ट्रिक) जनजातीय समूह की एक प्रमुख शाखा है। मध्य प्रदेश का विंध्य क्षेत्र (रीवा, सतना) और छत्तीसगढ़ का उत्तरी पहाड़ी हिस्सा (सरगुजा संभाग) इनका मुख्य निवास स्थान है। यह जनजाति अपनी प्राचीन परंपराओं, हिंदू धर्म के प्रति गहरी आस्था, कठोर परिश्रम और अपने अद्वितीय पारंपरिक न्याय तंत्र ('गोहिया' पंचायत) के लिए जानी जाती है।
इतिहास, उत्पत्ति एवं पौराणिक मान्यताएं (History & Mythology)
कोल जनजाति का इतिहास वैदिक और पौराणिक काल जितना पुराना माना जाता है। ऋग्वेद से लेकर महाभारत तक इनका उल्लेख मिलता है:
- रामायण काल और माता शबरी: प्राचीन हिंदू ग्रंथों में 'कोल' और 'भील' जनजातियों का स्पष्ट उल्लेख है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम को अपने जूठे बेर खिलाने वाली 'माता शबरी' को कोल समाज अपना आदि-पूर्वज (Ancestor) मानता है। इसलिए हिंदू धर्म और भगवान राम के प्रति इनकी अगाध श्रद्धा है।
- राजपूतों से संबंध और उपजातियां: कोल जनजाति कई उपजातियों में बंटी है, जिनमें 'रौतिया' (Rautia) और 'रौतेले/ठकुरिया' सबसे प्रमुख हैं। इनका मानना है कि ऐतिहासिक काल में इनके पूर्वजों का राजपूतों और स्थानीय राजाओं के साथ संबंध था। रौतिया कोल खुद को अन्य सभी उपजातियों से श्रेष्ठ मानते हैं।
- नामकरण का आधार: कुछ मानवशास्त्रियों का मानना है कि चूंकि ये लोग प्राचीन काल में जंगलों को साफ करने और कोयला (Coal) निकालने या बनाने का काम करते थे, इसलिए इनका नाम 'कोल' पड़ा। मुंडा भाषा में 'कोल' का अर्थ मानव (Human) भी होता है।
पारंपरिक न्याय व्यवस्था: 'गोहिया' पंचायत (Gohiya Panchayat)
कोल जनजाति में सामाजिक नियंत्रण, अनुशासन और अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए एक अत्यंत मजबूत पंचायत प्रणाली पाई जाती है, जिसे 'गोहिया' (Gohiya) या 'मय्यारी' कहा जाता है।
- मुखिया: गोहिया पंचायत का मुखिया 'गोंटिया' (Gontia), मुकद्दम या 'गोहिया' कहलाता है। यह पद आमतौर पर वंशानुगत (Hereditary) होता है।
- कार्यप्रणाली: समाज में आपसी विवाद, विवाह, तलाक, संपत्ति के बंटवारे और सामाजिक अपराधों से जुड़े सभी फैसले इसी पंचायत द्वारा किए जाते हैं। गोहिया पंचायत का निर्णय समाज के हर सदस्य के लिए अंतिम और सर्वमान्य होता है। इसका उल्लंघन करने वाले को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
आर्थिक जीवन एवं व्यवसाय (Economy & Occupation)
कोल जनजाति का आर्थिक जीवन मुख्य रूप से कृषि, खदानों में मजदूरी और वनोपज पर निर्भर है:
- कृषि और भूमिहीन मजदूर: ऐतिहासिक रूप से कोल लोग कुशल कृषक और खेतिहर मजदूर रहे हैं। ये दूसरों के खेतों में काम करने, मिट्टी काटने और बोझा ढोने में अत्यंत पारंगत होते हैं। हालांकि अब सरकार की योजनाओं से कई परिवारों ने अपनी स्थायी खेती (धान, गेहूं, मक्का) शुरू कर दी है।
- कोयला खदानों में कार्य: मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कोयला खदान (Coal Mines) क्षेत्रों (जैसे कोरबा, कोरिया, शहडोल) में रहने के कारण, वर्तमान में बड़ी संख्या में कोल जनजाति के लोग खदानों और कारखानों में मजदूरी का कार्य करते हैं।
- वनोपज संग्रहण: जंगलों से महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी, हर्रा और लकड़ी इकट्ठा कर हाट-बाजारों में बेचना इनकी आय का एक अन्य प्रमुख स्रोत है।
रहन-सहन और खान-पान (Lifestyle & Food)
आवास एवं वेशभूषा: कोल जनजाति के गांव या बस्तियां अक्सर मुख्य गांव से थोड़ी दूरी पर होते हैं, जिन्हें 'कोलहा टोला' (Kolha Tola) कहा जाता है। इनके घर मिट्टी और खपरैल से बने होते हैं जिन्हें बहुत साफ रखा जाता है। पुरुष धोती और कमीज (बंडी) पहनते हैं, जबकि महिलाएं सूती साड़ियां पहनती हैं। कोल महिलाओं को भारी चांदी और गिलट के आभूषणों (हंसली, पैरी) तथा गोदना (Tattoo) का बहुत शौक होता है।
खान-पान: इनका दैनिक भोजन चावल, मक्का, कोदो, और स्थानीय भाजियां हैं। ये लोग मांसाहारी भी होते हैं (मछली, मुर्गा, सुअर का मांस खाते हैं), लेकिन गाय या बैल का मांस खाना इनके समाज में पूर्णतः वर्जित है (धार्मिक कारण से)। महुआ की शराब (दारू) इनके सामाजिक, धार्मिक और विवाह अनुष्ठानों का एक अनिवार्य हिस्सा है।
प्रमुख लोकनृत्य: 'कोल दहका' (Kol Dahka Folk Dance)
कोल जनजाति की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान उनका पारंपरिक लोकनृत्य 'कोल दहका' (Kol Dahka) या 'कोल दहकी' है।
- यह एक अत्यंत ऊर्जावान, लयबद्ध और आकर्षक नृत्य है जो मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है।
- इस नृत्य में महिलाएं कतारबद्ध होकर आकर्षक मुद्राओं में नाचती हैं, जबकि पुरुष वाद्य यंत्र (मांदर, ढोल, झांझ और टिमकी) बजाते हैं और गीत गाते हैं।
- विवाह, कृषि उत्सवों और त्योहारों के समय यह नृत्य रात-रात भर किया जाता है।
देवी-देवता एवं धार्मिक आस्था (Deities & Religion)
कोल जनजाति पूरी तरह से हिंदू धर्म के बहुत करीब आ चुकी है और हिंदू देवी-देवताओं में इनकी अगाध आस्था है:
- प्रमुख देवता: ये भगवान राम, शिव, बजरंगबली (हनुमान जी) और दुर्गा माता की विशेष रूप से पूजा करते हैं।
- आदिवासी देवता: हिंदू देवताओं के साथ-साथ ये अपने पारंपरिक ग्राम देवताओं जैसे ठाकुर देव, दूल्हा देव, भैंसासुर, और सूर्य देव (सूरज देव) की भी पूजा करते हैं ताकि गांव को बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं से बचाया जा सके। बाघ को भी ये पवित्र मानते हैं।
- त्योहार: कोल समाज रामनवमी, दशहरा, दीपावली, होली (फाग), हरेली और जवारा जैसे त्योहारों को बड़े धूमधाम से मनाता है।
विवाह संस्कार (Wedding Ceremony)
कोल समाज पितृसत्तात्मक है और ये अपने ही गोत्र (समगोत्रीय) में विवाह नहीं करते।
- मंगनी और वधूमूल्य: समाज में माता-पिता द्वारा तय की गई शादी (मंगनी या क्रय विवाह) को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। विवाह तय होने पर वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को आर्थिक सहयोग और सम्मान के रूप में कपड़े, अनाज, शराब और नकद राशि दी जाती है, जिसे 'सुक' (वधूमूल्य) कहा जाता है।
- अन्य विवाह प्रथाएं: यदि कोई युवक वधूमूल्य नहीं दे पाता, तो वह 'लमसेना' (सेवा विवाह) करता है, जिसमें उसे होने वाले ससुर के घर काम करना पड़ता है। इसके अलावा समाज में विधवा पुनर्विवाह (चूड़ी प्रथा), गुरावट (विनिमय विवाह), और राजी-बाजी (प्रेम विवाह) को भी गोहिया पंचायत द्वारा मान्यता प्राप्त है। विवाह की रस्में गांव के बैगा या हिंदू ब्राह्मण द्वारा संपन्न कराई जाती हैं।
कोल जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: कोल जनजाति की पारंपरिक ग्राम पंचायत को किस नाम से जाना जाता है?
- उत्तर: इनकी पारंपरिक जातीय पंचायत को 'गोहिया' (Gohiya) या 'मय्यारी' कहा जाता है, जिसका मुखिया 'गोंटिया' या 'मुकद्दम' होता है। (यह प्रश्न परीक्षाओं में कई बार पूछा गया है)।
- प्रश्न: कोल जनजाति का सबसे प्रसिद्ध लोकनृत्य कौन सा है?
- उत्तर: 'कोल दहका' (Kol Dahka)। यह अत्यंत लयबद्ध और ऊर्जावान नृत्य है जो विशेषकर महिलाओं द्वारा वाद्य यंत्रों की थाप पर किया जाता है।
- प्रश्न: 'रौतिया' (Rautia) और 'रौतेले' (Thakuria) किस जनजाति की प्रमुख उपजातियां हैं?
- उत्तर: ये कोल जनजाति की सबसे प्रमुख और श्रेष्ठ मानी जाने वाली उपजातियां हैं।
- प्रश्न: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कोल जनजाति स्वयं को किस रामायणकालीन पात्र से जोड़ती है?
- उत्तर: ये स्वयं को भगवान राम की परम भक्त 'माता शबरी' के वंशज से जोड़कर देखते हैं।
- प्रश्न: कोल जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के किन क्षेत्रों में निवास करती है?
- उत्तर: मध्य प्रदेश के रीवा, सतना, सीधी, शहडोल (विंध्य क्षेत्र) और छत्तीसगढ़ के उत्तरी जिलों जैसे कोरिया, सरगुजा और सूरजपुर में। इनके मोहल्ले को 'कोलहा टोला' कहते हैं।