पण्डो जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Pando Tribe in Hindi

इस पोस्ट में छत्तीसगढ़ की अत्यंत प्राचीन और राज्य सरकार द्वारा 'विशेष पिछड़ी जनजाति' (State PVTG) का दर्जा प्राप्त पण्डो जनजाति (Pando Tribe in Hindi) के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, महाभारत के 'पांडवों' से उनके वंशज होने की मान्यता, उत्कृष्ट बांस शिल्प, रहन-सहन, उपजातियों (सरगुजिहा और उत्तराहा) और विवाह प्रथा का गहराई से वर्णन किया गया है।

Pando Tribe Overview (पण्डो जनजाति एक नजर में)
जनजाति का नाम पण्डो या पंडो जनजाति (Pando Tribe)
संवैधानिक दर्जा छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा घोषित 'विशेष पिछड़ी जनजाति' (State PVTG)।
पौराणिक पहचान स्वयं को महाभारत काल के 'पांडवों' (Pandavas) का वंशज मानते हैं।
प्रमुख उपजातियां सरगुजिहा पण्डो (मूल निवासी) और उत्तराहा पण्डो (प्रवासी)।
निवास स्थान मुख्य रूप से उत्तरी छत्तीसगढ़ यानी सरगुजा संभाग (सूरजपुर, सरगुजा, बलरामपुर, कोरिया)।
भाषा एवं बोली सरगुजिहा, छत्तीसगढ़ी और क्षेत्रीय हिंदी।
पारंपरिक व्यवसाय बांस शिल्प (Bamboo Craft), कृषि और वनोपज संग्रहण।

पण्डो जनजाति (Pando Janjati) - पण्डो जनजाति छत्तीसगढ़ के उत्तरी पहाड़ी और वन क्षेत्रों (मुख्यतः सरगुजा संभाग) में निवास करने वाली एक अत्यंत सीधी-सादी, शर्मीली और प्रकृति-प्रेमी जनजाति है। इनकी लगातार घटती जनसंख्या, शिक्षा के भारी अभाव और अत्यंत पिछड़ेपन को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने इन्हें 'विशेष पिछड़ी जनजाति' (State PVTG) का दर्जा दिया है। (नोट: छत्तीसगढ़ में कुल 7 विशेष पिछड़ी जनजातियां हैं, जिनमें से 5 केंद्र सरकार द्वारा और 2—पण्डो और भुंजिया—राज्य सरकार द्वारा घोषित हैं)। पण्डो जनजाति मुख्य रूप से अपनी पौराणिक मान्यताओं, महाभारत से जुड़ाव और उत्कृष्ट बांस शिल्प के लिए जानी जाती है।

इतिहास, उत्पत्ति एवं 'पांडवों' से संबंध (History & Mythology)

पण्डो जनजाति का इतिहास और उनकी उत्पत्ति की मान्यताएं हिंदू महाकाव्य 'महाभारत' से बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं:

  • पांडवों के वंशज: पण्डो जनजाति के लोग स्वयं को पूरी दृढ़ता और गर्व के साथ महाभारत के 'पांडवों' (Pandavas) का वंशज मानते हैं। इनकी पीढ़ियों से चली आ रही मौखिक कथाओं के अनुसार, जब पांडव अपना वनवास और 'अज्ञातवास' काट रहे थे, तब उन्होंने सरगुजा के घने जंगलों में भी लंबा समय बिताया था। इन्हीं पांडवों के वनवासी वंशज कालांतर में स्थानीय बोली के प्रभाव से 'पण्डो' कहलाए।
  • कौरवों से घृणा: अपनी इसी ऐतिहासिक मान्यता और वफादारी के कारण पण्डो समाज के लोग 'कौरवों' का नाम लेना भी पाप समझते हैं। इनके समाज में 'कौरव' शब्द का प्रयोग पूर्णतः वर्जित और अमंगलकारी माना जाता है।
  • धनुष-बाण का त्याग: चूंकि ये महान धनुर्धर 'अर्जुन' को अपना आदर्श मानते हैं, इसलिए ऐतिहासिक रूप से ये लोग धनुष-बाण का उपयोग जानवरों की हत्या या साधारण शिकार के लिए नहीं करते थे। शिकार के लिए वे केवल जाल और फंदे (Traps) का उपयोग करते हैं।

प्रमुख उपजातियां: सरगुजिहा और उत्तराहा (Sub-tribes)

भौगोलिक निवास और ऐतिहासिक पलायन के आधार पर पण्डो जनजाति मुख्य रूप से दो प्रमुख उपजातियों में विभाजित है:

  • सरगुजिहा पण्डो: ये वे पण्डो हैं जो सदियों से सरगुजा और सूरजपुर क्षेत्र के मूल निवासी रहे हैं। समाज में इन्हें अधिक शुद्ध, श्रेष्ठ और आदिम माना जाता है।
  • उत्तराहा पण्डो: ये वे पण्डो हैं जो ऐतिहासिक काल में उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश के उत्तरी सीमांत क्षेत्रों (विंध्य क्षेत्र) से पलायन करके छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में आकर बसे हैं। इन दोनों उपजातियों के रीति-रिवाजों में मामूली अंतर होता है और आमतौर पर इनके बीच वैवाहिक संबंध (Roti-Beti ka rishta) स्थापित नहीं होते हैं।

आर्थिक जीवन: उत्कृष्ट बांस शिल्प और कृषि (Economy & Bamboo Craft)

पण्डो जनजाति का आर्थिक जीवन पूरी तरह से वनों, बांस और कृषि पर निर्भर है:

  • बांस शिल्प (Bamboo Craft): कमार और कंडरा जनजाति की तरह ही पण्डो जनजाति भी बांस के बर्तन और उपयोगी वस्तुएं बनाने में अत्यंत निपुण होती है। ये लोग जंगलों से कच्चा बांस काटकर लाते हैं और अपनी कलात्मक उंगलियों से सूपा, टुकनी (टोकरी), पर्रा, बिजना (पंखा) और मछली पकड़ने के उपकरण बनाते हैं। इसे वे स्थानीय हाट-बाजारों में अनाज या पैसों के बदले बेचते हैं।
  • कृषि: पूर्व में ये लोग जंगलों को साफ करके 'बेवार' या स्थानांतरित खेती करते थे, लेकिन अब वन कानूनों के कारण इन्होंने पहाड़ों की ढलानों और मैदानों पर स्थायी खेती अपना ली है। ये मुख्य रूप से मक्का, कोदो-कुटकी, उड़द, सरसों और धान की खेती करते हैं।
  • वनोपज संग्रहण: वनों से चिरौंजी, महुआ, हर्रा, बहेड़ा, साल बीज और लाख इकट्ठा कर आजीविका चलाना इनके दैनिक जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।

रहन-सहन और खान-पान (Lifestyle & Food)

आवास एवं वेशभूषा: पण्डो लोगों के गांव बहुत छोटे होते हैं (आमतौर पर 15-20 घरों के) और ये अक्सर जंगलों के पास या पहाड़ियों की तलहटी में बसे होते हैं। इनके घर लकड़ी, बांस, मिट्टी और घास-फूस से बने होते हैं, जिन्हें महिलाएं लाल मिट्टी (छुही) और गोबर से बहुत सुंदर लीप कर रखती हैं। पुरुष आमतौर पर एक छोटी धोती और बंडी पहनते हैं, जबकि महिलाएं पारंपरिक 'लुगरा' (साड़ी) पहनती हैं। पण्डो महिलाओं को कांच व गिलट की चूड़ियों, भारी आभूषणों और गोदना (Tattoo) का बहुत शौक होता है।

खान-पान: इनका मुख्य दैनिक भोजन मक्का और ज्वार की 'पेज' (Page - एक प्रकार का तरल सूप), चावल और मौसमी जंगली भाजियां हैं। ये लोग अच्छे शिकारी होते हैं और मांसाहार (मछली, मुर्गा, जंगली सूअर) इनके भोजन का अहम हिस्सा है। महुआ की शराब और ताड़ी का सेवन इनके समाज में देवताओं को चढ़ाने और सामाजिक उत्सवों के लिए अनिवार्य माना जाता है।

देवी-देवता एवं त्योहार (Deities & Festivals)

पण्डो जनजाति हिंदू धर्म और प्रकृति पूजा का एक अनूठा संगम है:

  • प्रमुख देवता: ये लोग 'बड़ा देव' (महादेव/शिव) और 'ठाकुर देव' को अपना सर्वोच्च देवता मानते हैं। इसके अलावा बीमारियों और बुरी शक्तियों से बचने के लिए दूल्हा देव, शीतला माता, और ग्राम रक्षक देवताओं की पूजा मुर्गा, बकरी या नारियल चढ़ाकर की जाती है।
  • त्योहार एवं लोकनृत्य: पण्डो समाज नवाखाई (नया अनाज खाना), हरेली (कृषि उपकरणों की पूजा), करमा पर्व, दशहरा, दीपावली और होली (फाग) बहुत धूमधाम से मनाता है। इन अवसरों पर गांव के स्त्री-पुरुष मांदर की थाप पर मिलकर पारंपरिक 'करमा नृत्य' और विवाह के समय विशेष विवाह नृत्य करते हैं।

विवाह संस्कार (Wedding Ceremony)

पण्डो समाज पितृसत्तात्मक है और ये टोटम (Totem) आधारित गोत्रों (जैसे बाघ, कछुआ, नाग, नेवला) में बंटे होते हैं। समगोत्रीय (एक ही गोत्र में) विवाह इनके समाज में एक बड़ा अपराध माना जाता है और यह पूरी तरह वर्जित है।

  • दूध-लौटावा (Cross-cousin Marriage): गोंडों की तरह ही पण्डो समाज में भी ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों (बुआ और मामा की संतानों) के बीच विवाह को सबसे अधिक शुभ और समाज में श्रेष्ठ माना जाता है।
  • वधूमूल्य: समाज में 'मंगनी' (आयोजित विवाह) सबसे आम है। विवाह तय होने पर वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को सम्मान और आर्थिक सहयोग के रूप में कपड़े, अनाज (चावल/दाल), महुआ की शराब और नकद राशि दी जाती है, जिसे समाज में 'सुक' (वधूमूल्य) कहा जाता है।
  • अन्य प्रकार: यदि कोई युवक गरीब है और वधूमूल्य नहीं दे पाता, तो वह 'लमसेना' (सेवा विवाह) करता है, जिसमें उसे अपने होने वाले ससुर के घर काम करना पड़ता है। इसके अलावा समाज की पारंपरिक पंचायत द्वारा विधवा पुनर्विवाह (चूड़ी प्रथा) और उढ़रिया (भागकर शादी) को भी पूर्ण मान्यता प्राप्त है।

पण्डो जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)

प्रश्न: पण्डो जनजाति स्वयं को किस पौराणिक पात्र का वंशज मानती है?
उत्तर: पण्डो जनजाति स्वयं को पूरे गर्व के साथ महाभारत काल के 'पांडवों' (Pandavas) का वंशज मानती है और इसी कारण वे कौरवों का नाम लेना भी पाप समझते हैं।
प्रश्न: छत्तीसगढ़ में पण्डो जनजाति को क्या संवैधानिक दर्जा प्राप्त है?
उत्तर: पण्डो जनजाति को छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा 'विशेष पिछड़ी जनजाति' (State PVTG) का दर्जा दिया गया है (भुंजिया जनजाति के साथ)।
प्रश्न: पण्डो जनजाति का प्रमुख पारंपरिक व्यवसाय क्या है?
उत्तर: बांस शिल्प (Bamboo Craft)। ये बांस को छीलकर उत्कृष्ट टोकरी, सूपा, पर्रा और अन्य उपयोगी कृषि उपकरण बनाने के लिए जाने जाते हैं।
प्रश्न: 'सरगुजिहा' और 'उत्तराहा' किस जनजाति की प्रमुख उपजातियां हैं?
उत्तर: ये पण्डो जनजाति की दो प्रमुख उपजातियां हैं, जो उनके मूल निवास और पलायन के आधार पर बंटी हैं।
प्रश्न: पण्डो जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के किन जिलों में निवास करती है?
उत्तर: मुख्य रूप से उत्तरी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर, सरगुजा, बलरामपुर और कोरिया जिलों में (सरगुजा संभाग)।
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