चेरो जनजाति: इतिहास, पलामू का चेरो राजवंश, 12 हजारी-13 हजारी और संस्कृति | Chero Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मुख्य रूप से झारखंड (विशेषकर पलामू क्षेत्र) में निवास करने वाली, ऐतिहासिक रूप से एक शासक वर्ग रही और स्वयं को 'च्यवनवंशी राजपूत' मानने वाली वीर चेरो जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके गौरवशाली इतिहास, पलामू के चेरो राजवंश (राजा मेदिनी राय), समाज के दो प्रमुख वर्गों (बारह हजारी और तेरह हजारी), उन्नत कृषि और गोत्र (पारी) व्यवस्था का गहराई से कथात्मक वर्णन किया गया है।
| Chero Tribe Overview (चेरो जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | चेरो (Chero) / च्यवनवंशी राजपूत |
| उत्पत्ति की मान्यता | स्वयं को च्यवन ऋषि (Chyavana Rishi) का वंशज और क्षत्रिय (राजपूत) मानते हैं। |
| मुख्य निवास स्थान | मुख्यतः झारखंड (पलामू, लातेहार, गढ़वा), बिहार (रोहतास) और उत्तर प्रदेश (सोनभद्र)। |
| सामाजिक विभाजन | दो प्रमुख वर्ग— बारह हजारी (12 Hazar) और तेरह हजारी (13 Hazar / बीरबंधिया)। |
| भाषा एवं बोली | सदानी (सादरी), भोजपुरी और क्षेत्रीय हिंदी। |
| ऐतिहासिक गौरव | पलामू का चेरो राजवंश (प्रसिद्ध शासक: राजा मेदिनी राय) और पलामू के किलों का निर्माण। |
चेरो जनजाति (Chero Janjati) - चेरो भारत की एक अत्यंत ऐतिहासिक और गौरवशाली जनजाति है, जिसका संबंध सीधे तौर पर सत्ता और राजकाज से रहा है। झारखंड के जनजातीय इतिहास में चेरो एकमात्र ऐसी जनजाति है जिसने एक लंबे समय तक एक विशाल भूभाग (पलामू) पर अपना सुदृढ़ राज्य स्थापित किया और शासन किया। मानवशास्त्रीय रूप से ये द्रविड़ प्रजाति से संबंधित हैं, लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से इन्होंने हिंदू धर्म और राजपूत परंपराओं को इतनी गहराई से अपना लिया है कि ये स्वयं को जनजाति (आदिवासी) कहलाने के बजाय 'राजपूत' कहलाना अधिक पसंद करते हैं।
1. इतिहास, उत्पत्ति और पलामू का चेरो राजवंश (History & Palamu Kingdom)
चेरो जनजाति का इतिहास उनके शौर्य, शासन और किलों के निर्माण से भरा हुआ है:
- च्यवनवंशी राजपूत: चेरो समुदाय की दृढ़ मान्यता है कि वे प्राचीन काल के महान 'च्यवन ऋषि' (Chyavana Rishi) के वंशज हैं। इसी आधार पर वे स्वयं को 'च्यवनवंशी राजपूत' और हिंदू वर्ण व्यवस्था में क्षत्रिय मानते हैं। अपने नाम के अंत में ये अक्सर 'सिंह' उपनाम लगाते हैं।
- पलामू पर शासन (Chero Dynasty): 16वीं शताब्दी में चेरो राजाओं ने पलामू क्षेत्र (झारखंड) में रक्सेल राजपूतों को हराकर अपना राज्य स्थापित किया। लगभग 200 वर्षों तक पलामू पर चेरो राजवंश का शासन रहा।
- राजा मेदिनी राय (King Medini Ray): चेरो राजवंश के सबसे प्रतापी, न्यायप्रिय और प्रसिद्ध राजा मेदिनी राय (1658-1674 ई.) थे। उनके शासनकाल को पलामू का 'स्वर्ण युग' (Golden Era) कहा जाता है, क्योंकि उस समय प्रजा अत्यधिक सुखी और समृद्ध थी। पलामू के प्रसिद्ध किलों (पुराना और नया किला) का निर्माण भी चेरो राजाओं द्वारा ही करवाया गया था।
2. सामाजिक संरचना: 12 हजारी और 13 हजारी (Social Structure & Divisions)
चेरो समाज पितृसत्तात्मक है और सामाजिक हैसियत के आधार पर दो स्पष्ट वर्गों में बंटा हुआ है:
- बारह हजारी (Bara-hazar): यह चेरो समाज का उच्च और कुलीन वर्ग है। ये वे लोग हैं जिनके पूर्वज सीधे तौर पर चेरो राजवंश, राजाओं, दीवानों और बड़े जागीरदारों से जुड़े थे। ये स्वयं को अधिक शुद्ध और श्रेष्ठ मानते हैं।
- तेरह हजारी या बीरबंधिया (Tera-hazar / Birbandhia): यह दूसरा वर्ग है, जिसे 'बीरबंधिया' भी कहा जाता है। बारह हजारी लोग इन्हें सामाजिक रूप से अपने से थोड़ा नीचा मानते हैं। पारंपरिक रूप से इन दोनों वर्गों के बीच वैवाहिक संबंध (रोटी-बेटी का व्यवहार) नहीं होता है।
- पारी (Gotra): चेरो समाज कई बहिर्विवाही गोत्रों में विभाजित है, जिसे इनकी भाषा में 'पारी' (Pari) कहा जाता है। प्रमुख पारियों में मउआर, कुंवर, सवत, और रउतिया शामिल हैं।
3. आर्थिक जीवन: उन्नत कृषि (Economy & Agriculture)
ऐतिहासिक रूप से शासक और जमींदार रहे चेरो लोग कभी भी वनों या वनोपज पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहे:
- स्थायी कृषि: वर्तमान में चेरो जनजाति पूरी तरह से स्थायी कृषि (Settled Agriculture) पर निर्भर है। ये बहुत अच्छे किसान होते हैं और मैदानी तथा नदी घाटियों की उपजाऊ भूमि पर खेती करते हैं। धान (चावल), गेहूं, मक्का और चना इनकी मुख्य फसलें हैं।
- पशुपालन और रोजगार: कृषि के साथ-साथ ये गाय, भैंस और बैल पालते हैं। वर्तमान में इस समाज के युवा शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों, सेना और पुलिस में भी बड़ी संख्या में जा रहे हैं।
4. धर्म, देवी-देवता और बैगा (Religion & Deities)
चेरो जनजाति का धार्मिक जीवन पूरी तरह से हिंदू धर्म के कर्मकांडों से प्रभावित है:
- प्रमुख देवी-देवता: ये भगवान शिव (महादेव), दुर्गा, पार्वती, राम और हनुमान जी की अत्यंत गहरी श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं। इसके साथ ही, स्थानीय आदिवासी परंपरा के अनुसार 'दरहा' (Darha) और 'दिवार' (Dihwar) जैसे ग्राम देवताओं की भी पूजा की जाती है।
- ब्राह्मण पुरोहित और बैगा: चूंकि ये स्वयं को राजपूत मानते हैं, इसलिए इनके जन्म, विवाह और मृत्यु के अधिकांश संस्कार ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न कराए जाते हैं। लेकिन गांव की बीमारियों और भूत-प्रेत से रक्षा के लिए ये स्थानीय आदिवासी पुजारी 'बैगा' (Baiga) की भी मदद लेते हैं।
5. विवाह प्रथाएं और वधूमूल्य (Marriage Customs)
चेरो समाज में विवाह के नियम हिंदू राजपूत समाज से काफी मिलते-जुलते हैं:
- विवाह के प्रकार: चेरो जनजाति में मुख्य रूप से तीन प्रकार के विवाह प्रचलित हैं— चढ़ाऊ (Chadhau) विवाह (जिसमें दूल्हा, दुल्हन के घर जाकर विवाह करता है), डोला (Dola) विवाह (गरीबी के कारण दुल्हन को दूल्हे के घर लाकर विवाह किया जाता है), और सगाई (विधवा पुनर्विवाह)।
- दस्तूरी या झांपी (Bride Price): विवाह के समय वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को कुछ नकद राशि देने की प्रथा है, जिसे वधूमूल्य कहते हैं। चेरो जनजाति में इसे 'दस्तूरी' या 'झांपी' कहा जाता है।
- रहन-सहन: इनके घर आमतौर पर मिट्टी, ईंट और खपरैल से बने होते हैं। घरों की सजावट और सफाई मुख्यधारा के ग्रामीण समाज जैसी ही होती है। मांसाहार का प्रचलन है, लेकिन गोमांस (Beef) खाना पूर्णतः वर्जित और एक बड़ा सामाजिक पाप माना जाता है।
चेरो जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: चेरो जनजाति स्वयं को किस ऋषि का वंशज और किस वर्ण का मानती है?
- उत्तर: चेरो स्वयं को प्राचीन 'च्यवन ऋषि' (Chyavana Rishi) का वंशज मानते हैं। इसी आधार पर वे स्वयं को च्यवनवंशी राजपूत (क्षत्रिय) कहते हैं।
- प्रश्न: चेरो समाज के दो सबसे प्रमुख सामाजिक वर्ग (विभाजन) कौन से हैं?
- उत्तर: सामाजिक दर्जे के आधार पर चेरो समाज दो प्रमुख वर्गों में बंटा है— बारह हजारी (12 Hazar - उच्च/कुलीन) और तेरह हजारी (13 Hazar या बीरबंधिया)।
- प्रश्न: पलामू (झारखंड) के उस प्रसिद्ध चेरो राजा का क्या नाम था जिसके शासनकाल को 'स्वर्ण युग' कहा जाता है?
- उत्तर: उस न्यायप्रिय और महान चेरो शासक का नाम राजा मेदिनी राय (King Medini Ray) था, जिन्होंने कृषि और प्रजा के कल्याण के लिए कई कार्य किए।
- प्रश्न: चेरो जनजाति में गोत्र (Clans) को स्थानीय भाषा में क्या कहा जाता है?
- उत्तर: चेरो समाज के बहिर्विवाही गोत्रों को 'पारी' (Pari) कहा जाता है। समान 'पारी' में विवाह करना वर्जित होता है।
- प्रश्न: चेरो समाज में विवाह के दौरान दिए जाने वाले वधूमूल्य (Bride Price) को क्या कहते हैं?
- उत्तर: चेरो जनजाति में विवाह के समय वर पक्ष द्वारा दिए जाने वाले वधूमूल्य को 'दस्तूरी' या 'झांपी' कहा जाता है।