गोराइत जनजाति: इतिहास, उत्पत्ति, संस्कृति और समाज की प्रामाणिक जानकारी | Gorait Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मुख्य रूप से झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में निवास करने वाली एक अत्यंत संगीत-प्रेमी, मिलनसार और ऐतिहासिक रूप से गांव के संदेशवाहक/डकवा गोराइत जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, 'डकवा' के रूप में उनके महत्व, पारंपरिक ढोल और नगाड़ा बजाने (Drum beating) के पेशे, टोटेमिक गोत्र व्यवस्था (जैसे इंडुआर और खाल्खो), धार्मिक पुजारी 'बैगा' और सरना तथा हिंदू धर्म के साथ उनके सांस्कृतिक समन्वय का संपूर्ण कथात्मक वर्णन किया गया है।
| Gorait Tribe Overview (गोराइत जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | गोराइत (Gorait) / इन्हें कोरैत (Korait) और 'डकवा' (Dakua) भी कहा जाता है। |
| प्रजातीय समूह | प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड (Proto-Australoid) प्रजातीय समूह का हिस्सा। |
| मुख्य निवास स्थान | मुख्यतः झारखंड (रांची, हजारीबाग, पलामू, सिंहभूम, धनबाद), बिहार और पश्चिम बंगाल। |
| भाषा एवं बोली | सादरी (Sadri), मुंडारी, कुड़माली और क्षेत्रीय हिंदी। |
| पारंपरिक व्यवसाय | गांव के संदेशवाहक (डकवा), मांदर/नगाड़ा वादक, चौकीदारी और कृषि। |
| धार्मिक पुजारी | बैगा (Baiga) (गांव का धार्मिक और आध्यात्मिक प्रमुख)। |
गोराइत जनजाति (Gorait Janjati) - गोराइत भारत की, विशेषकर छोटानागपुर पठार की, एक लघु (Minority) लेकिन सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण अनुसूचित जनजाति (ST) है। झारखंड के जनजातीय समाज में मुंडा और उरांव जैसी बड़ी जनजातियों के साथ इनका संबंध सदियों पुराना और पूरक रहा है। ग्रामीण प्रशासन और सामाजिक आयोजनों में गोराइत समुदाय की भूमिका एक महत्वपूर्ण 'कड़ी' की रही है। ये लोग स्वभाव से बहुत ही शांतिप्रिय, सहयोगी और कला-प्रेमी होते हैं। जनजातीय उत्सवों का मुख्य केंद्र 'अखड़ा' (Akhra) गोराइत के मांदर और नगाड़े की थाप के बिना हमेशा अधूरा माना जाता है।
1. इतिहास, उत्पत्ति और ग्रामीण प्रशासन में भूमिका (History & Village Role)
गोराइत जनजाति का इतिहास ग्रामीण प्रशासन (Village Administration) में उनकी अनिवार्य उपयोगिता को दर्शाता है:
- मूल प्रजाति और बसावट: मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से, गोराइत जनजाति 'प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड' (Proto-Australoid) नस्ल से संबंधित है। इनकी शारीरिक बनावट और मूल संस्कृति अन्य ऑस्ट्रो-एशियाटिक जनजातियों (जैसे मुंडा और संथाल) से बहुत अधिक मेल खाती है। ये लोग कभी भी अलग-थलग नहीं रहे, बल्कि बड़ी जनजातियों के गांवों के किनारे अपनी बस्ती बसाकर रहते आए हैं।
- 'डकवा' या संदेशवाहक की ऐतिहासिक भूमिका: अतीत में, जब संचार के आधुनिक साधन (फोन, लाउडस्पीकर) नहीं थे, तब गोराइत जनजाति के लोग गांव के आधिकारिक संदेशवाहक (जिन्हें 'डकवा' कहा जाता था) और चौकीदार हुआ करते थे। गांव के मुखिया (मुंडा या पाहन) का कोई भी आदेश गांव वालों तक पहुंचाना हो, पंचायत की बैठक बुलानी हो, त्योहार की सूचना देनी हो, या गांव पर आए किसी बाहरी खतरे से आगाह करना हो, यह काम गोराइत लोग ही गांव में घूम-घूम कर मुनादी करके करते थे।
- जनसंख्या: इनकी जनसंख्या बहुत कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में गोराइत जनजाति की कुल जनसंख्या मात्र 4,937 के आसपास थी, जो इन्हें राज्य की सबसे छोटी और विलुप्तप्राय जनजातियों में से एक बनाती है।
2. सामाजिक संरचना: टोटेमिक गोत्र और परिवार (Social Structure & Clans)
गोराइत समाज पितृसत्तात्मक (Patriarchal) है और इनकी पारिवारिक व्यवस्था अन्य जनजातियों की तरह ही अत्यंत अनुशासित है:
- टोटेम आधारित गोत्र (Clans): गोराइत समाज अनेक बहिर्विवाही गोत्रों (Gotra / Kili) में बंटा हुआ है। इनके गोत्र प्रकृति, पशु और पक्षियों (Totem) पर आधारित होते हैं। इनके प्रमुख गोत्रों में खाल्खो (एक प्रकार की मछली), इंडुआर (Induar - ईल मछली), टोप्पो (एक पक्षी), और केरकेट्टा (एक पक्षी) शामिल हैं। ये अपने गोत्र चिह्न की पूजा करते हैं और उसे मारना या खाना उनके समाज में पाप माना जाता है। समान गोत्र में विवाह करना पूर्णतः वर्जित है।
- विवाह प्रथाएं: समाज में मुख्य रूप से माता-पिता द्वारा तय विवाह (Negotiated marriage) का ही प्रचलन है। विवाह के समय वर पक्ष द्वारा नकद राशि या सामान के रूप में वधूमूल्य (Bride Price) देने की अनिवार्य प्रथा है। समाज में देवर विवाह (Junior levirate), शाली विवाह (Junior sororate), विधवा पुनर्विवाह और पंचायत की सहमति से तलाक को पूरी सामाजिक मान्यता प्राप्त है।
- पारिवारिक संपत्ति: पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति का बंटवारा सभी पुत्रों में समान रूप से होता है। बेटियों को जमीन का हिस्सा नहीं मिलता। निसंतान दंपत्ति के मामले में संपत्ति भाई के पुत्रों को हस्तांतरित हो जाती है।
3. आर्थिक जीवन: वाद्य यंत्र, हस्तशिल्प और कृषि (Economy & Livelihood)
गोराइत जनजाति का आर्थिक जीवन शारीरिक श्रम और उनके संगीत तथा कलात्मक हुनर पर आधारित है:
- ड्रम वादन (Drum Beating) और संगीत: गोराइत लोग जन्मजात संगीतकार होते हैं। जनजातीय त्योहारों (जैसे सरहुल, कर्मा), विवाह समारोहों और मेलों में मांदर, ढोल और नगाड़ा बजाना इनका सबसे प्रमुख पुश्तैनी पेशा रहा है। ये वाद्य यंत्र बजाने के साथ-साथ खुद अपने लिए तीर-धनुष, बांसुरी और मांदर जैसे वाद्य यंत्र बनाने में भी अत्यंत कुशल होते हैं।
- कृषि और मजदूरी: आधुनिक संचार साधनों के आने से 'डकवा' (संदेशवाहक) का इनका पारंपरिक पेशा खत्म हो गया। आजीविका के लिए अब इस समाज का एक बड़ा हिस्सा कृषि (Farming) की ओर मुड़ गया है। जिन परिवारों के पास अपनी पर्याप्त कृषि भूमि नहीं है, वे दूसरों के खेतों में, ईंट-भट्टों पर या शहरों में खेतिहर और दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं।
- हस्तशिल्प (Bamboo Crafts): गोराइत समुदाय के लोग बांस, सरकंडे और घास से अत्यंत सुंदर व उपयोगी वस्तुएं (जैसे टोकरियां, सूप, चटाइयां और झाड़ू) बनाने में भी माहिर होते हैं, जिन्हें वे स्थानीय हाट-बाजारों में बेचकर अतिरिक्त आय प्राप्त करते हैं।
4. धर्म, देवी-देवता और 'बैगा' (Religion & Deities)
गोराइत जनजाति के धार्मिक विश्वासों में सरना (आदिवासी प्रकृति पूजा) और हिंदू धर्म का अत्यंत गहरा समन्वय (Syncretism) देखने को मिलता है:
- प्रमुख देवता: ये लोग प्रकृति की शक्तियों की पूजा करते हैं। मुख्य रूप से देवी माई (ग्राम देवी), वन देव (Vana Deo), पुरूबिया (दिशाओं के देवता), और बूढ़ा देव की आराधना की जाती है। लंबे समय से हिंदू समाज के संपर्क में रहने के कारण मां काली और शिव के प्रति भी इनकी गहरी आस्था होती है।
- पूर्वज पूजा (Ancestor Worship): गोराइत समाज का यह दृढ़ विश्वास है कि मृत्यु के बाद आत्मा नष्ट नहीं होती और उनके पूर्वजों की आत्माएं (Ancestral spirits) घर के एक विशेष हिस्से और सरना स्थल (पवित्र उपवन) में निवास करती हैं। परिवार की रक्षा, अच्छी फसल और सुख-शांति के लिए वे अपने पूर्वजों की नियमित पूजा करते हैं और उन्हें भोजन अर्पित करते हैं।
- पुजारी 'बैगा': गांव के सभी बड़े धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराने, भूत-प्रेत से रक्षा के लिए झाड़-फूंक करने और ग्राम देवताओं को प्रसन्न करने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'बैगा' (Baiga) कहा जाता है।
5. संस्कृति, त्योहार और रहन-सहन (Culture, Festivals & Lifestyle)
गोराइत संस्कृति अत्यंत जीवंत, संगीतमय और प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है:
- त्योहार: ये लोग प्रकृति और कृषि चक्र से जुड़े सभी आदिवासी त्योहार जैसे सरहुल (Sarhul - वसंतोत्सव), कर्मा (Karma - भाई-बहन का पर्व), जितिया (Jitia), नवाखानी और सोहराय (पशु पूजा) बहुत धूमधाम से मनाते हैं। हिंदू धर्म के प्रभाव के कारण ये होली (फगुआ), दीपावली, दशहरा और रामनवमी भी पूरे उल्लास के साथ मनाते हैं। इन सभी त्योहारों पर गोराइत समुदाय का सामूहिक नृत्य और गायन अनिवार्य होता है।
- रहन-सहन और घर: गोराइत जनजाति के घर आमतौर पर बहुत साधारण (मिट्टी और खपरैल के) होते हैं, जिनमें अक्सर एक या दो कमरे होते हैं। घर से सटा हुआ एक बरामदा होता है, जिसका उपयोग वे मवेशियों (Cattle shed) को बांधने या वाद्य यंत्रों को रखने के लिए करते हैं।
- वेशभूषा और आभूषण: गरीबी के बावजूद गोराइत महिलाओं को सजना-संवरना बहुत पसंद होता है। वे सूती साड़ियां पहनती हैं और पीतल, स्टील, कांच, धागे और कभी-कभी चांदी से बने पारंपरिक आभूषण धारण करती हैं। महिलाओं में गोदना (Tattooing) का प्रचलन भी देखा जाता है।
गोराइत जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: गोराइत जनजाति का ऐतिहासिक और सबसे प्रमुख पारंपरिक व्यवसाय क्या रहा है?
- उत्तर: ऐतिहासिक रूप से गोराइत लोग गांव के आधिकारिक संदेशवाहक (जिन्हें डकवा कहा जाता था), चौकीदार और उत्सवों में ढोल, मांदर और नगाड़ा बजाने (Drum beaters) का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करते आए हैं।
- प्रश्न: गोराइत जनजाति समाज में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने वाले पुजारी को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: गोराइत समाज में गांव के पूजा-पाठ कराने, भूत-प्रेत से रक्षा करने और अनुष्ठान संपन्न कराने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'बैगा' (Baiga) कहा जाता है।
- प्रश्न: गोराइत जनजाति मुख्य रूप से भारत के किन राज्यों में निवास करती है?
- उत्तर: यह जनजाति मुख्य रूप से पूर्वी भारत के झारखंड (रांची, पलामू, हजारीबाग, सिंहभूम), बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में निवास करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी आबादी बहुत कम है।
- प्रश्न: गोराइत समाज की गोत्र व्यवस्था किस पर आधारित है और उनके प्रमुख गोत्र कौन से हैं?
- उत्तर: इनकी गोत्र व्यवस्था पशु-पक्षियों और प्रकृति (Totemism) पर आधारित है। इनके प्रमुख गोत्रों में खाल्खो (मछली), इंडुआर (Induar), टोप्पो और केरकेट्टा (पक्षी) शामिल हैं। समान गोत्र में विवाह वर्जित है।
- प्रश्न: गोराइत जनजाति मुख्य रूप से किन देवी-देवताओं की आराधना करती है?
- उत्तर: ये लोग मुख्य रूप से देवी माई, वन देव (Vana Deo), पुरूबिया और अपने पूर्वजों की आत्माओं (Ancestral spirits) की पूजा करते हैं। इसके साथ ही इन पर हिंदू देवी-देवताओं (जैसे मां काली) का भी गहरा प्रभाव है।