सहरिया जनजाति: इतिहास, संस्कृति, सहराना और सीताबाड़ी मेला | Sahariya Tribe in Hindi
इस पोस्ट में राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर निवास करने वाली एक अत्यंत पिछड़ी, शर्मीली और वन-आश्रित सहरिया जनजाति (Sahariya Tribe in Hindi) के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। भारत सरकार ने इनकी दयनीय आर्थिक स्थिति को देखते हुए इन्हें 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG - आदिम जनजाति) का दर्जा दिया है। इस लेख में उनके इतिहास, निवास स्थान (सहराना), पंचायत के मुखिया (पटेल), कत्था बनाने के पारंपरिक पेशे और उनके सबसे बड़े 'सीताबाड़ी मेले' का गहराई से वर्णन किया गया है।
| Sahariya Tribe Overview (सहरिया जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | सहरिया (Sahariya / Saharia) |
| शाब्दिक अर्थ | फारसी शब्द 'सहर' (Sahar) से उत्पत्ति, जिसका अर्थ 'जंगल' होता है (जंगल के निवासी)। |
| निवास स्थान | मुख्य रूप से राजस्थान (बारां जिले की शाहाबाद और किशनगंज तहसील) तथा मध्य प्रदेश (ग्वालियर, शिवपुरी, गुना)। |
| बस्ती और मुखिया | इनकी बस्ती को 'सहराना' और मुखिया को 'पटेल' कहा जाता है। |
| सबसे बड़ा मेला | सीताबाड़ी का मेला (केलवाड़ा, बारां) - जिसे सहरिया जनजाति का कुंभ कहा जाता है। |
| संवैधानिक दर्जा | PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group) यानी आदिम जनजाति। |
सहरिया जनजाति (Sahariya Janjati) - सहरिया जनजाति मुख्य रूप से मध्य भारत (राजस्थान और मध्य प्रदेश) के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में निवास करने वाली एक अत्यंत शर्मीली और एकांतप्रिय जनजाति है। यह राजस्थान की एकमात्र ऐसी जनजाति है जिसे भारत सरकार ने 'आदिम जनजाति' (PVTG) की सूची में शामिल किया है। सहरिया लोग स्वभाव से बहुत सीधे, ईमानदार और प्रकृति प्रेमी होते हैं। वे कभी भीख नहीं मांगते, बल्कि जंगलों से जड़ी-बूटियां और लकड़ियां चुनकर अपना स्वाभिमानी जीवन जीते हैं।
1. इतिहास और उत्पत्ति (History & Origin)
सहरिया जनजाति की उत्पत्ति और नामकरण के संबंध में कई ऐतिहासिक और भाषाई मान्यताएं हैं:
- 'सहर' शब्द से उत्पत्ति: 'सहरिया' शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा के शब्द 'सहर' (Sahar) से मानी जाती है, जिसका अर्थ होता है—'जंगल'। चूंकि ये लोग प्राचीन काल से ही घने जंगलों में निवास करते आए हैं, इसलिए मुस्लिम शासकों और स्थानीय लोगों ने इन्हें 'सहरिया' (जंगल में रहने वाले) कहना शुरू कर दिया।
- भीलों से संबंध: कई मानवशास्त्रियों का मानना है कि सहरिया मूल रूप से भील जनजाति की ही एक शाखा है, जो समय के साथ भौगोलिक अलगाव के कारण एक स्वतंत्र जनजाति के रूप में विकसित हो गई।
- पौराणिक मान्यता: सहरिया लोग स्वयं को रामायण की 'माता शबरी' का वंशज भी मानते हैं।
2. सामाजिक संरचना: सहराना, हथाई और पटेल (Social Structure)
सहरिया समाज की बसाहट और प्रशासनिक व्यवस्था बहुत ही व्यवस्थित और अनूठी होती है:
- सहराना (Saharana): सहरिया जनजाति जिस बस्ती या गांव में निवास करती है, उसे 'सहराना' कहा जाता है। इनका गांव मुख्य गांव से थोड़ा दूर स्थित होता है।
- हथाई या बंगला (Hathai/Bangla): हर सहराना (गांव) के ठीक बीचों-बीच एक गोल छतरीनुमा झोपड़ी या चबूतरा होता है, जिसे 'हथाई' या 'बंगला' कहते हैं। यह गांव का सामुदायिक केंद्र होता है जहां शाम को लोग इकट्ठा होते हैं और पंचायत बैठती है।
- पटेल (Patel): सहरिया गांव (सहराना) के मुखिया को 'पटेल' कहा जाता है। गांव के सभी विवादों का निपटारा पटेल की अध्यक्षता में 'हथाई' पर बैठकर ही किया जाता है।
- इनके समाज में संयुक्त परिवार प्रथा का अभाव होता है; विवाह के तुरंत बाद लड़का अपना अलग घर (झोपड़ी) बना लेता है।
3. आर्थिक जीवन: वनोपज और कत्था निर्माण (Economy & Livelihood)
सहरिया जनजाति आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़ी हुई है और इनकी आजीविका मुख्य रूप से जंगलों (Forests) पर निर्भर है:
- वनोपज संग्रहण: सहरिया लोग जंगलों से शहद (Honey), गोंद, मूसली, चिरौंजी, महुआ और दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियां इकट्ठा करते हैं और उन्हें स्थानीय बाजारों में बेचकर अपना गुजारा करते हैं। शहद निकालने में ये बहुत माहिर होते हैं।
- कत्था बनाना: खैर (Khair) के पेड़ों की छाल से 'कत्था' (Catechu) बनाना सहरिया जनजाति का एक प्रमुख पारंपरिक पेशा रहा है।
- कृषि और मजदूरी: कृषि के मामले में ये बहुत पिछड़े हैं। भूमिहीन होने के कारण वर्तमान में अधिकांश सहरिया लोग बड़े किसानों के खेतों में खेतिहर मजदूर (हाली) के रूप में काम करते हैं।
4. संस्कृति, नृत्य और वेशभूषा (Culture & Dance)
सहरिया जनजाति की संस्कृति बहुत ही रंग-बिरंगी और प्रकृति से जुड़ी हुई है:
- प्रमुख नृत्य: सहरिया जनजाति के नृत्यों में शिकारी नृत्य (Shikari Dance) सबसे प्रसिद्ध है, जिसमें शिकार करने का स्वांग रचा जाता है। इसके अलावा ये लहंगी (Lhangi) और इंद्रपरी नृत्य भी करते हैं।
- वेशभूषा: सहरिया पुरुष धोती, अंगरखी (सलूका) और सिर पर साफा (खपटा) पहनते हैं। महिलाएं घाघरा, लुगड़ी और विशेष प्रकार की चुनरी (रेजा) पहनती हैं।
- गोदना (Tattoos): सहरिया महिलाओं में गोदना गुदवाने (टैटू) का अत्यधिक शौक होता है, लेकिन पुरुषों में गोदना गुदवाना वर्जित माना जाता है।
5. प्रमुख मेले: सहरियों का कुंभ (Fairs & Festivals)
सहरिया जनजाति में मेलों का अत्यधिक महत्व है, जो इनके सामाजिक मिलन का सबसे बड़ा साधन हैं:
- सीताबाड़ी का मेला (Sitabari Fair): राजस्थान के बारां जिले के केलवाड़ा (शाहाबाद) में ज्येष्ठ अमावस्या को लगने वाला यह मेला सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा और पवित्र मेला है। इसे 'सहरिया जनजाति का कुंभ' कहा जाता है। यहाँ ये लोग अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन भी करते हैं (जिसे 'धारी संस्कार' कहते हैं)।
- कपिलधारा का मेला: बारां जिले में ही कार्तिक पूर्णिमा को यह मेला भरता है, जो सहरियों की आस्था का एक और बड़ा केंद्र है।
6. धर्म और देवी-देवता (Religion & Deities)
सहरिया लोग मुख्य रूप से हिंदू धर्म और प्रकृति पूजा को मानते हैं:
- प्रमुख देवियां: सहरिया जनजाति की कुलदेवी 'कोड़िया माता' (Kodiyamata) हैं। इसके अलावा ये 'सीता माता' की परम श्रद्धा से पूजा करते हैं (सीताबाड़ी का मेला इसी आस्था का प्रतीक है)।
- प्रमुख लोकदेवता: लोकदेवता तेजाजी (Tejaji) और भैरव (Bhairav) सहरियाओं के सबसे प्रिय देवता हैं। लगभग हर सहरिया गांव (सहराना) में तेजाजी का चबूतरा (थान) अनिवार्य रूप से पाया जाता है।
सहरिया जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: सहरिया जनजाति का सबसे प्रसिद्ध मेला कौन सा है और इसे क्या कहा जाता है?
- उत्तर: 'सीताबाड़ी का मेला' (बारां, राजस्थान) सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा मेला है, जिसे 'सहरिया जनजाति का कुंभ' कहा जाता है।
- प्रश्न: सहरिया जनजाति की बस्ती (गांव) और उनके मुखिया को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: सहरिया जनजाति की बस्ती या गांव को 'सहराना' और गांव के मुखिया को 'पटेल' कहा जाता है। बस्ती के बीच बने सामुदायिक केंद्र को 'हथाई' कहते हैं।
- प्रश्न: राजस्थान की वह एकमात्र जनजाति कौन सी है जिसे भारत सरकार ने 'आदिम जनजाति' (PVTG) का दर्जा दिया है?
- उत्तर: सहरिया जनजाति। अत्यधिक पिछड़ेपन और वनों पर पूर्ण निर्भरता के कारण इन्हें PVTG सूची में रखा गया है।
- प्रश्न: सहरिया जनजाति मुख्य रूप से किन क्षेत्रों में निवास करती है?
- उत्तर: यह जनजाति भारत में राजस्थान के बारां जिले (शाहाबाद और किशनगंज तहसील) और उससे सटे मध्य प्रदेश के ग्वालियर, शिवपुरी और गुना जिलों में सर्वाधिक पाई जाती है।
- प्रश्न: सहरिया जनजाति का प्रमुख पारंपरिक पेशा क्या रहा है?
- उत्तर: जंगलों से जड़ी-बूटियां, शहद इकट्ठा करना और विशेषकर खैर के पेड़ों से 'कत्था' (Catechu) बनाना इनका प्रमुख पारंपरिक पेशा है।