कोरा जनजाति: इतिहास, उत्पत्ति, कार्य और संस्कृति | Kora (Mudi-Kora) Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा में निवास करने वाली, ऐतिहासिक रूप से अपनी कठोर मेहनत और 'मिट्टी कोड़ने' (Earth-digging) के पुश्तैनी कौशल के लिए विख्यात कोरा जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, 'कोरा' (मिट्टी खोदने वाले) शब्द की उत्पत्ति, उनके पारंपरिक व्यवसाय (तालाब और कुएं खोदना), टोटेमिक गोत्र (किल्ली) व्यवस्था और उनके पारंपरिक पुजारी 'नाया' (Naya) का गहराई से कथात्मक वर्णन किया गया है।
| Kora (Mudi-Kora) Tribe Overview (कोरा जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | कोरा (Kora) / पश्चिम बंगाल में इन्हें मुड़ी-कोरा (Mudi-Kora) भी कहा जाता है। |
| शाब्दिक अर्थ/उत्पत्ति | 'कोड़ना' (मिट्टी खोदना) से उत्पत्ति; ऐतिहासिक रूप से ये मिट्टी काटने वाले (Earthworkers) हैं। |
| मुख्य निवास स्थान | मुख्यतः पश्चिम बंगाल (पुरुलिया, बांकुड़ा, मेदिनीपुर), झारखंड (धनबाद, बोकारो, संताल परगना) और ओडिशा। |
| भाषा एवं बोली | कोरा बोली (मुंडारी परिवार), बंगाली, कुड़माली, सादरी और हिंदी। |
| पारंपरिक व्यवसाय | मिट्टी काटना (Earthwork), तालाब खोदना, सड़क निर्माण और कृषि मजदूरी। |
| धार्मिक पुजारी | नाया (Naya) या लाया (Laya) (गांव का धार्मिक प्रमुख)। |
कोरा / मुड़ी-कोरा जनजाति (Kora Janjati) - कोरा एक अत्यंत परिश्रमी, सरल और ऐतिहासिक रूप से भूमि से जुड़ी हुई अनुसूचित जनजाति (ST) है। मानवशास्त्रीय और भाषाई दृष्टिकोण से कोरा जनजाति 'ऑस्ट्रो-एशियाटिक' (मुंडा) प्रजातीय समूह का हिस्सा है और इनकी संस्कृति मुंडा, संथाल और भूमिज जनजातियों से बहुत अधिक मिलती-जुलती है। पश्चिम बंगाल में इन्हें विशेष रूप से 'मुड़ी-कोरा' के नाम से जाना जाता है और वहां इनकी एक बड़ी आबादी निवास करती है। जहां मुंडा या उरांव जनजातियां जंगलों को साफ कर खेत बनाने में माहिर थीं, वहीं कोरा जनजाति जमीन को खोदकर तालाब बनाने और मिट्टी के बांध बनाने (Earthwork) में बेजोड़ मानी जाती थी।
1. इतिहास, उत्पत्ति और 'मुड़ी-कोरा' का अर्थ (History & Origin)
कोरा जनजाति का इतिहास उनके शारीरिक श्रम और मिट्टी से उनके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है:
- 'कोरा' शब्द की उत्पत्ति: स्थानीय सदानी और मुंडारी भाषाओं में 'कोड़ना' या 'कोड़ा' का अर्थ होता है मिट्टी खोदना (To dig the earth)। चूंकि प्राचीन काल से ही इस समुदाय का मुख्य पेशा कुदाल (Spade) से मिट्टी खोदना, तालाब बनाना और खाइयां खोदना रहा है, इसलिए अन्य समुदायों ने इन्हें 'कोरा' कहना शुरू कर दिया।
- मुड़ी-कोरा (Mudi-Kora): पश्चिम बंगाल (विशेषकर पुरुलिया, बांकुड़ा और मेदिनीपुर) में रहने वाले कोरा समुदाय को 'मुड़ी' (Mudi) या 'मुड़ी-कोरा' कहा जाता है। 'मुड़ी' शब्द यहां एक सम्मानजनक उपनाम या स्थानीय पहचान के रूप में प्रयोग होता है।
- मुंडा समूह का हिस्सा: इतिहासकारों (जैसे एच.एच. रिजले) का मानना है कि कोरा मूल रूप से 'मुंडा' जनजाति की ही एक पेशेवर शाखा है, जो मिट्टी काटने का काम करने के कारण एक अलग जनजाति (कोरा) के रूप में स्थापित हो गई।
2. आर्थिक जीवन: मिट्टी का काम (Earthwork) और कृषि (Economy)
कोरा जनजाति का आर्थिक जीवन हमेशा से कुदाल और पसीने का प्रतीक रहा है:
- पारंपरिक पेशा (Earthwork): ऐतिहासिक रूप से कोरा जनजाति का सबसे प्रमुख व्यवसाय मिट्टी का काम रहा है। जमींदारों और राजाओं के समय में बड़े-बड़े तालाब (Ponds) खोदना, कुएं बनाना, सड़कों के लिए मिट्टी काटना और खेतों की मेड़ (बांध) बनाना केवल कोरा समुदाय ही सबसे कुशलता से करता था।
- कृषि और मजदूरी: आधुनिक मशीनों (जैसे जेसीबी/ट्रैक्टर) के आने से इनका यह पुश्तैनी पेशा छिन गया। आज कोरा जनजाति का बड़ा हिस्सा भूमिहीन हो चुका है। आजीविका के लिए अब ये कृषि मजदूर (Agricultural Laborers), ईंट-भट्टों के मजदूर और चाय बागानों (असम/बंगाल) में काम करने वाले श्रमिकों के रूप में जीवन यापन कर रहे हैं।
- स्थायी कृषि: जिन कुछ परिवारों के पास जमीन है, वे मुख्य रूप से धान (Rice) और सब्जियों की खेती करते हैं।
3. सामाजिक संरचना: गोत्र व्यवस्था और पंचायत (Social Structure)
कोरा समाज पितृसत्तात्मक है और इनकी पंचायत व्यवस्था अन्य मुंडा जनजातियों जैसी ही सुदृढ़ है:
- टोटेमिक गोत्र (Gotra/Killi): कोरा समाज कई बहिर्विवाही गोत्रों में विभाजित है, जिन्हें 'गुष्ठी' (Gusti) या 'किल्ली' कहा जाता है। इनके गोत्र प्रकृति, पशु और पक्षियों (Totem) पर आधारित होते हैं, जैसे—कच्छप (कछुआ), नाग, सांड, धान, आदि। समान गोत्र में विवाह करना समाज में सख्त वर्जित है।
- महतो या प्रधान (Mahato): कोरा समाज की ग्रामीण पंचायत के मुखिया को आमतौर पर 'महतो' (Mahato), 'प्रधान' या 'मालिक' कहा जाता है। गांव के सभी पारिवारिक और सामाजिक झगड़ों का निपटारा पंचायत द्वारा ही किया जाता है।
- विवाह प्रथा ('पोन'): समाज में मुख्य रूप से तय विवाह का प्रचलन है। विवाह के समय वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को वधूमूल्य देने की अनिवार्य प्रथा है, जिसे कोरा समाज में 'पोन' (Pon) या 'डाली टका' कहा जाता है। समाज में विधवा पुनर्विवाह ('सांगा') और तलाक को भी पंचायत की सहमति से मान्यता प्राप्त है।
4. धर्म, देवी-देवता और 'नाया' (Religion & Deities)
कोरा (मुड़ी-कोरा) जनजाति की धार्मिक आस्थाओं में सरना धर्म (प्रकृति पूजा) और क्षेत्रीय हिंदू (बंगाली) धर्म का गहरा प्रभाव दिखाई देता है:
- सिंगबोंगा और धरम देवता: अन्य मुंडा जनजातियों की तरह ही कोरा भी 'सिंगबोंगा' (Singbonga - सूर्य देवता) या 'धरम देवता' को अपना सर्वोच्च देवता मानते हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता हैं।
- ग्राम देवता और मनसा देवी: ये गांव की रक्षा के लिए 'ग्राम सिरी' (ग्राम देवता) और सर्पों से रक्षा के लिए 'मनसा देवी' (Manasa Devi) की अत्यंत श्रद्धा से पूजा करते हैं, जो पश्चिम बंगाल के प्रभाव को दर्शाता है।
- पुजारी 'नाया' (Naya): कोरा समाज में गांव के सभी धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराने, भूत-प्रेत से रक्षा करने और देवी-देवताओं को प्रसन्न करने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'नाया' (Naya) या 'लाया' (Laya) कहा जाता है। (झारखंड के कुछ हिस्सों में इन्हें 'बैगा' भी कहा जाता है)।
5. संस्कृति, त्योहार और रहन-सहन (Culture, Festivals & Lifestyle)
कोरा संस्कृति अत्यंत सादगीपूर्ण और कृषि चक्र से गहराई से जुड़ी हुई है:
- प्रमुख त्योहार (टुसू और करम): पश्चिम बंगाल और झारखंड की सीमा पर रहने के कारण कोरा जनजाति टुसू पर्व (Tusu Parab) (जो मकर संक्रांति पर मनाया जाता है) बहुत ही धूमधाम से मनाती है। इसके अलावा करम (Karam), सरहुल (Sarhul), और सोहराय/बांदना (पशुओं की पूजा का पर्व) इनके प्रमुख त्योहार हैं।
- गीत-नृत्य और वाद्य यंत्र: त्योहारों के अवसर पर ढोल, मांदर और नगाड़े की थाप पर सामूहिक नृत्य करना इनके जीवन का अभिन्न अंग है। कोरा और कुड़माली लोकगीत इनके उत्सवों में गाए जाते हैं।
- रहन-सहन और घर: मिट्टी का काम करने वाले होने के कारण, कोरा लोगों के मिट्टी के घर (Mud houses) बहुत ही मजबूत और सुंदर होते हैं। दीवारों को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है। महिलाएं साड़ियां पहनती हैं और उनमें गोदना (Tattoo) गुदवाने का पारंपरिक शौक पाया जाता है।
कोरा (मुड़ी-कोरा) जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: 'कोरा' शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई है और इसका शाब्दिक अर्थ क्या है?
- उत्तर: 'कोरा' शब्द की उत्पत्ति 'कोड़ना' (मिट्टी खोदना) से हुई है। ऐतिहासिक रूप से यह मिट्टी काटने और कुदाल चलाने वाला समुदाय है, इसलिए इन्हें कोरा कहा गया।
- प्रश्न: पश्चिम बंगाल में कोरा जनजाति को विशेष रूप से किस नाम से जाना जाता है?
- उत्तर: पश्चिम बंगाल (पुरुलिया, बांकुड़ा, मेदिनीपुर) में कोरा जनजाति को स्थानीय रूप से 'मुड़ी-कोरा' (Mudi-Kora) के नाम से जाना जाता है।
- प्रश्न: कोरा जनजाति का ऐतिहासिक और सबसे प्रमुख पारंपरिक व्यवसाय क्या रहा है?
- उत्तर: इनका सबसे प्रमुख पारंपरिक व्यवसाय मिट्टी का काम (Earthwork) रहा है, जिसमें तालाब खोदना, कुएं बनाना, खाइयां खोदना और खेतों की मेड़ बनाना शामिल है।
- प्रश्न: कोरा (मुड़ी-कोरा) समाज में गांव के धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने वाले पुजारी को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: कोरा समाज में गांव के पूजा-पाठ कराने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'नाया' (Naya) या 'लाया' (Laya) कहा जाता है।
- प्रश्न: मानवशास्त्रीय और भाषाई दृष्टि से कोरा जनजाति किस प्रजातीय समूह का हिस्सा मानी जाती है?
- उत्तर: कोरा जनजाति ऑस्ट्रो-एशियाटिक (मुंडा) प्रजातीय समूह का हिस्सा मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, यह मूल रूप से मुंडा जनजाति की ही एक पेशेवर शाखा है।