मांकिडिया जनजाति: इतिहास, सियाली रस्सी निर्माण, कुंबा झोपड़ी और घुमंतू जीवन | Mankidia Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मुख्य रूप से ओडिशा में निवास करने वाली, भारत के विशेष रूप से PVTG में शामिल और अपने घुमंतू (Nomadic) जीवन के लिए प्रसिद्ध मांकिडिया जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, 'मांकड़' (बंदर) से उनके नाम की उत्पत्ति, सियाली (Siali) की लताओं से रस्सी बनाने के उनके पुश्तैनी कौशल, उनकी पत्तों से बनी अनोखी झोपड़ी 'कुंबा' (Kumba) और उनकी बस्ती 'टांडा' (Tanda) का गहराई से कथात्मक वर्णन किया गया है।
| Mankidia Tribe Overview (मांकिडिया जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | मांकिडिया (Mankidia) / इन्हें मांकिडी (Mankidi) भी कहा जाता है। |
| शाब्दिक अर्थ/उत्पत्ति | ओड़िया शब्द 'मांकड़' (Mankada - बंदर) से उत्पत्ति; ऐतिहासिक रूप से बंदर पकड़ने में माहिर। |
| मुख्य निवास स्थान | मुख्यतः ओडिशा का मयूरभंज जिला (सिमिलिपाल वन क्षेत्र), क्योंझर और सुंदरगढ़। |
| सामाजिक विशेषता | अर्ध-घुमंतू (Semi-nomadic) जीवनशैली; इनकी बस्ती को 'टांडा' (Tanda) कहते हैं। |
| भाषा एवं बोली | मांकिडी (मुंडा/ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार) और क्षेत्रीय ओड़िया। |
| पारंपरिक व्यवसाय | सियाली (Siali) की लताओं से रस्सी बनाना और वनोपज संग्रहण। |
| अनोखा आवास | पेड़ की डालियों और पत्तों से बनी गुंबद के आकार की झोपड़ी 'कुंबा' (Kumba)। |
मांकिडिया जनजाति (Mankidia Janjati) - मांकिडिया ओडिशा की एक अत्यंत आदिम, एकांतप्रिय और घुमंतू (Nomadic) अनुसूचित जनजाति (PVTG) है। जंगलों से इनका जुड़ाव इतना गहरा है कि आज के आधुनिक युग में भी ये जंगलों के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहते हैं। मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण से, मांकिडिया जनजाति को 'बिरहोर' (Birhor) जनजाति की ही एक शाखा माना जाता है, जो समय के साथ झारखंड से ओडिशा की ओर पलायन कर गई। ये मुख्य रूप से वनोपज पर निर्भर हैं और इनकी पूरी अर्थव्यवस्था 'सियाली' नामक जंगली लता के इर्द-गिर्द घूमती है।
1. इतिहास, उत्पत्ति और 'मांकड़' से जुड़ाव (History & Origin)
मांकिडिया जनजाति का इतिहास उनके घुमंतू स्वभाव और विलक्षण शिकार कौशल को दर्शाता है:
- 'मांकिडिया' शब्द का अर्थ: ओड़िया भाषा में 'मांकड़' (Mankada) का अर्थ 'बंदर' (Monkey) होता है। ऐतिहासिक रूप से, इस जनजाति के लोग पेड़ों पर चढ़ने में अत्यधिक फुर्तीले थे और जंगलों में बंदरों को पकड़ने (Catching monkeys) में माहिर थे। इसी विशिष्ट कौशल के कारण स्थानीय लोगों ने इन्हें 'मांकिडिया' कहना शुरू कर दिया।
- बिरहोर से संबंध: मांकिडिया लोग मूल रूप से ऑस्ट्रो-एशियाटिक (मुंडा) प्रजातीय समूह का हिस्सा हैं। इनकी भाषा, संस्कृति और घुमंतू जीवनशैली झारखंड की 'बिरहोर' जनजाति से पूरी तरह मेल खाती है। वास्तव में, इन्हें ओडिशा में बिरहोरों का ही एक विस्तार माना जाता है।
- सिमिलिपाल का जंगल: ओडिशा का सिमिलिपाल बायोस्फीयर रिजर्व (मयूरभंज) इनका मुख्य घर रहा है। हालांकि, वन्यजीव संरक्षण कानूनों के लागू होने के बाद इनके पारंपरिक शिकार और जंगलों में स्वतंत्र रूप से घूमने पर कई प्रतिबंध लग गए हैं।
2. सामाजिक संरचना: 'टांडा' बस्ती और गोत्र (Social Structure & Tanda)
मांकिडिया समाज पितृसत्तात्मक है और इनका सामाजिक संगठन इनके घुमंतू जीवन के अनुकूल बना हुआ है:
- टांडा (Tanda - Settlement): मांकिडिया लोगों का कोई स्थायी गांव नहीं होता। ये जंगलों में 10-15 परिवारों का एक समूह बनाकर अस्थायी बस्ती बसाते हैं, जिसे 'टांडा' (Tanda) कहा जाता है। जब एक जगह पर 'सियाली' की लताएं और वनोपज खत्म हो जाते हैं, तो पूरा टांडा अपना डेरा समेटकर जंगल में किसी नई जगह पर चला जाता है।
- टोटेमिक गोत्र: इनका समाज भी कई बहिर्विवाही गोत्रों (Clans) में विभाजित है, जो प्रकृति, पशु और पक्षियों पर आधारित होते हैं, जैसे— सिकरिया, हेम्ब्रम आदि। समान गोत्र में विवाह करना सख्त वर्जित है।
- पंचायत का मुखिया: हर टांडा (बस्ती) का अपना एक मुखिया या नेता होता है, जो सभी सामाजिक, विवाह और विवाद संबंधी फैसले लेता है।
3. आर्थिक जीवन: सियाली रस्सी निर्माण (Economy & Siali Craft)
मांकिडिया जनजाति की पूरी आजीविका जंगल की एक विशेष लता पर निर्भर है:
- सियाली रस्सी (Siali Rope Making): मांकिडिया लोगों का सबसे प्रमुख और पुश्तैनी व्यवसाय 'सियाली' (Siali - Bauhinia vahlii) की लताओं के रेशों (Bark/Fiber) से मजबूत रस्सी बनाना है। पुरुष जंगल की गहराई में जाकर सियाली की लताएं काट लाते हैं, और महिलाएं उन्हें छीलकर, सुखाकर और गूंथकर रस्सियां, जाल और टोकरियां बनाती हैं।
- वनोपज संग्रहण: रस्सी बनाने के साथ-साथ ये शहद (Honey), मोम, साल के पत्ते, मशरूम और कंदमूल इकट्ठा करते हैं। सियाली की रस्सियों और वनोपज को वे जंगल के बाहर स्थानीय हाट-बाजारों में बेचकर या चावल के बदले (वस्तु विनिमय) बदल कर अपना गुजारा करते हैं।
- शिकार की पाबंदी: अतीत में बंदर और छोटे जानवरों का शिकार करना इनके जीवन का हिस्सा था, लेकिन कड़े वन्यजीव कानूनों के कारण अब इन्होंने इसे काफी हद तक छोड़ दिया है।
4. अनोखा आवास: पत्तों की झोपड़ी 'कुंबा' (Unique Dwelling: Kumba)
घुमंतू जीवनशैली के कारण मांकिडिया लोग स्थायी ईंट-मिट्टी के घर नहीं बनाते हैं:
- कुंबा (Kumba): मांकिडिया लोगों के पारंपरिक और अस्थायी घर को 'कुंबा' (Kumba) कहा जाता है। यह साल के पत्तों, टहनियों और छाल से बनी एक गुंबद के आकार (Dome-shaped) की छोटी सी झोपड़ी होती है। (यह तथ्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है)।
- कुंबा का निर्माण: कुंबा बनाना मुख्य रूप से महिलाओं का काम होता है। इसे इस तरह से बनाया जाता है कि यह बारिश के पानी को अंदर आने से रोकता है और सर्दियों में गर्म रहता है। जब वे नई जगह जाते हैं, तो इसे वहीं छोड़ देते हैं और नया कुंबा बनाते हैं।
5. धर्म, देवी-देवता और 'देहुरी' (Religion & Deities)
मांकिडिया जनजाति प्रकृति और अदृश्य शक्तियों की अत्यंत गहरी उपासक है:
- सर्वोच्च देवता (लोगू बुरु / सिंगबोंगा): अन्य मुंडा जनजातियों की तरह मांकिडिया भी 'सिंगबोंगा' (सूर्य देवता) और 'लोगू बुरु' (Logu Buru) को अपना सर्वोच्च देवता और रचयिता मानते हैं।
- वन देवी और ग्राम सिरी: क्योंकि उनका पूरा जीवन जंगल में बीतता है, इसलिए वे जंगल की रक्षा करने वाली 'वन देवी' और वन आत्माओं की विशेष पूजा करते हैं। हर नए जंगल में डेरा डालने से पहले वे वहां की शक्तियों को शांत करने के लिए पूजा करते हैं।
- पुजारी 'देहुरी' (Dehuri): टांडा (बस्ती) के सभी धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराने, भूत-प्रेत और जंगली जानवरों से रक्षा के लिए पूजा करने वाले पारंपरिक पुजारी को प्रायः 'देहुरी' (Dehuri) या 'नाया' कहा जाता है।
मांकिडिया जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: मांकिडिया जनजाति का नाम 'मांकिडिया' कैसे पड़ा और इसका क्या अर्थ है?
- उत्तर: ओड़िया भाषा में 'मांकड़' का अर्थ बंदर (Monkey) होता है। ऐतिहासिक रूप से जंगलों में बंदरों को पकड़ने के इनके विशिष्ट कौशल के कारण ही इन्हें 'मांकिडिया' कहा जाने लगा।
- प्रश्न: मांकिडिया जनजाति का सबसे प्रमुख और पुश्तैनी व्यवसाय क्या है?
- उत्तर: मांकिडिया लोगों का सबसे प्रमुख व्यवसाय जंगलों से 'सियाली' (Siali) की लताएं काटकर उनके रेशों से रस्सियां बनाना है, जिसे वे बाजारों में बेचते हैं।
- प्रश्न: मांकिडिया जनजाति की अस्थायी बस्ती और पत्तों से बनी झोपड़ी को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: इनकी अस्थायी बस्ती या घुमंतू समूह को 'टांडा' (Tanda) कहा जाता है, और टहनियों व पत्तों से बनी इनकी गुंबदनुमा झोपड़ी को 'कुंबा' (Kumba) कहा जाता है।
- प्रश्न: मांकिडिया जनजाति मुख्य रूप से भारत के किस राज्य में निवास करती है?
- उत्तर: यह घुमंतू और आदिम (PVTG) जनजाति मुख्य रूप से ओडिशा राज्य के मयूरभंज (सिमिलिपाल वन क्षेत्र), क्योंझर और सुंदरगढ़ जिलों में निवास करती है।
- प्रश्न: मानवशास्त्रीय दृष्टि से मांकिडिया जनजाति को किस अन्य प्रसिद्ध जनजाति की शाखा माना जाता है?
- उत्तर: भाषा, संस्कृति और घुमंतू जीवनशैली की समानताओं के कारण मांकिडिया जनजाति को मुख्य रूप से झारखंड की 'बिरहोर' (Birhor) जनजाति की ही एक शाखा माना जाता है।