संथाल (संताल) जनजाति: इतिहास, संताल हूल, ओल चिकी लिपि, संस्कृति और समाज | Santhal Tribe in Hindi

इस पोस्ट में मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में निवास करने वाली, जनसंख्या की दृष्टि से झारखंड की सबसे बड़ी और भारत की तीसरी सबसे बड़ी संथाल या संताल जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके गौरवशाली इतिहास, 1855 के 'संथाल हूल' (Santhal Rebellion), 12 गोत्रों और 4 वर्णों (हड़) की सामाजिक व्यवस्था, सबसे कठोर सजा 'बिटलाहा' (Bitlaha), उनकी अपनी 'ओल चिकी' (Ol Chiki) लिपि, और ग्राम प्रधान 'मांझी' तथा पुजारी 'नायके' का गहराई से कथात्मक वर्णन किया गया है।

Santhal Tribe Overview (संथाल जनजाति एक नजर में)
जनजाति का नाम संथाल या संताल (Santhal / Santal)
प्रजातीय समूह प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड (Proto-Australoid) प्रजातीय समूह।
मुख्य निवास स्थान मुख्यतः झारखंड का संथाल परगना (दुमका, गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज), पश्चिम बंगाल और ओडिशा।
भाषा एवं लिपि संथाली (Santhali) भाषा और 'ओल चिकी' (Ol Chiki) लिपि।
पंचायत का मुखिया मांझी (Manjhi)। (सहायक: जोग मांझी)
धार्मिक पुजारी नायके (Naeke) (गांव का धार्मिक और आध्यात्मिक प्रमुख)।
सर्वोच्च देवता मरांग बुरु (Marang Buru) या ठाकुर जीउ।

संथाल (संताल) जनजाति (Santhal Janjati) - संथाल जनजाति भारत की सबसे प्रमुख, जीवंत और ऐतिहासिक जनजातियों में से एक है। भील और गोंड के बाद, यह भारत की तीसरी और झारखंड राज्य की सबसे बड़ी (कुल जनजातीय आबादी का लगभग 35%) जनजाति है। अपने पारंपरिक ज्ञान, स्पष्ट सामाजिक नियमों, नृत्य-संगीत और कृषि कौशल के लिए संथाल जनजाति पूरे विश्व में जानी जाती है। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ इनका विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज इनकी मातृभाषा 'संथाली' भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल होने वाली एकमात्र मुंडारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) भाषा है।

1. इतिहास, उत्पत्ति और ऐतिहासिक 'संथाल हूल' (History & Santhal Rebellion)

संथाल जनजाति का इतिहास उनके संघर्ष, स्वाभिमान और भूमि से उनके जुड़ाव की अमर गाथा है:

  • नाम की उत्पत्ति: मानवशास्त्रियों के अनुसार, प्राचीन काल में इस समुदाय का लंबा निवास पश्चिम बंगाल के 'साओंत' (Saont) नामक क्षेत्र में रहा। साओंत में रहने के कारण ही कालान्तर में इन्हें 'संथाल' (साओंत-आल) कहा जाने लगा। इसके अलावा ये स्वयं को 'होड़ को' (Hor ko) यानी 'मनुष्य' कहना पसंद करते हैं।
  • संथाल हूल (Santhal Rebellion, 1855): जब अंग्रेजों, जमींदारों और महाजनों ने इनके जंगलों और जमीनों पर कब्जा करना और भारी कर (Tax) वसूलना शुरू किया, तब 1855 ई. में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव नामक चार भाइयों के नेतृत्व में संथालों ने एक महाविद्रोह किया। इस सशस्त्र और खूनी विद्रोह को इतिहास में 'संथाल हूल' (Santhal Hul) कहा जाता है। कार्ल मार्क्स ने इसे 'भारत की प्रथम जनक्रांति' कहा था।
  • संथाल परगना का निर्माण: इसी विद्रोह (हूल) से घबराकर अंग्रेजों ने 1855 में एक अलग और विशेष प्रशासनिक जिला 'संथाल परगना' (Santhal Pargana) बनाया, जिसे 'दामिन-ए-कोह' (Damin-i-koh) क्षेत्र कहा जाता था, ताकि संथालों की भूमि और अधिकारों की रक्षा की जा सके।

2. सामाजिक संरचना: 4 वर्ण (हड़), 12 गोत्र और 'बिटलाहा' (Social Structure)

संथाल समाज की सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था अत्यधिक सुव्यवस्थित, कठोर और अनुशासित है:

  • 4 वर्ग (हड़ / Had): संथाल समाज हिंदू वर्ण व्यवस्था की तरह ही पारंपरिक रूप से चार प्रमुख वर्गों (हड़) में विभाजित है: 1. किस्कू हड़ (राजा/शासक), 2. मुर्मू हड़ (पुजारी/धार्मिक कार्य), 3. सोरेन हड़ (सिपाही/सैनिक), और 4. मरुंडी हड़ (कृषक/किसान)।
  • 12 गोत्र (Paris): संथाल समाज में कुल 12 बहिर्विवाही गोत्र (Paris) पाए जाते हैं। इनमें मुर्मू, हांसदा, सोरेन, किस्कू, मरांडी, टुडू, बास्के, बेसरा आदि प्रमुख हैं। समान गोत्र में विवाह करना सबसे बड़ा पाप माना जाता है।
  • मांझी-परगना व्यवस्था: संथालों की स्वशासन व्यवस्था को 'मांझी-परगना' व्यवस्था कहा जाता है। गांव के मुखिया को 'मांझी' (Manjhi) कहते हैं। मांझी का सहायक 'जोग मांझी' और संदेशवाहक 'गोड़ैत' (Godait) कहलाता है। 15-20 गांवों को मिलाकर एक 'परगना' बनता है, जिसके प्रमुख को 'परगनैत' कहते हैं।
  • बिटलाहा (Bitlaha): संथाल समाज में गोत्र के अंदर यौन संबंध (Incest) बनाने या समाज के नियमों का घोर उल्लंघन करने पर सबसे कठोर और भयानक सजा दी जाती है, जिसे 'बिटलाहा' कहा जाता है। यह एक प्रकार का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) है, जिसमें अपराधी को समाज और गांव से हमेशा के लिए बाहर निकाल दिया जाता है।

3. आर्थिक जीवन: उन्नत कृषक (Economy & Agriculture)

आर्थिक दृष्टि से संथाल जनजाति बहुत पहले ही घुमंतू जीवन त्यागकर स्थायी और उन्नत कृषक बन चुकी है:

  • स्थायी कृषि: संथाल अत्यंत परिश्रमी किसान होते हैं। ये पहाड़ों की तलहटी और नदी घाटियों में धान (Rice), मक्का, बाजरा और सब्जियों की बहुत अच्छी खेती करते हैं। कृषि ही इनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
  • आखेट (शिकार) और बुनाई: यद्यपि ये कृषक हैं, लेकिन आज भी इन्हें तीर-धनुष से शिकार (Hunting) करने का बहुत शौक है। शिकार इनके लिए एक अनुष्ठान के समान है। संथाल महिलाएं चटाई बनाने और संथाल पुरुष बुनाई व लकड़ी के काम में माहिर होते हैं।
  • हड़िया (Handia) और पौचा: चावल से बनी पारंपरिक शराब 'हड़िया' इनके खान-पान, अतिथि सत्कार और धार्मिक अनुष्ठानों का एक अनिवार्य हिस्सा है।

4. धर्म: 'मरांग बुरु', 'जाहेर एरा' और पुजारी 'नायके' (Religion & Deities)

संथालों का धर्म प्रकृति पूजा (सरना) पर आधारित है और इनके देवी-देवता इनके दैनिक जीवन से गहराई से जुड़े हैं:

  • सर्वोच्च देवता: संथालों के सर्वोच्च देवता और सृष्टि के रचयिता 'ठाकुर जीउ' (Thakur Jiu) या 'मरांग बुरु' (Marang Buru - सबसे बड़ा पहाड़/देवता) हैं।
  • जाहेर एरा (Jaher Era): गांव की मुख्य देवी 'जाहेर एरा' हैं, जो गांव को बीमारियों और बाहरी विपत्तियों से बचाती हैं।
  • जाहेर थान (Jaher Than): संथाल गांव में सखुआ (साल) के पेड़ों का एक पवित्र झुरमुट (Grove) होता है, जहां उनके देवी-देवता निवास करते हैं और पूजा की जाती है। इस पवित्र स्थान को 'जाहेर थान' कहा जाता है।
  • धार्मिक पुजारी 'नायके' (Naeke): गांव के सभी धार्मिक अनुष्ठानों को संपन्न कराने और जाहेर थान में पूजा करने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'नायके' (Naeke) कहा जाता है। नायके का पद बहुत पवित्र और सम्मानजनक होता है।

5. संस्कृति, लिपि (ओल चिकी), विवाह (बापला) और त्योहार (Culture & Festivals)

संथाल संस्कृति अपनी समृद्धि, विवाह की अनूठी रस्मों और लिपि के लिए पूरे भारत में विख्यात है:

  • ओल चिकी लिपि (Ol Chiki Script): संथाल अपनी भाषा 'संथाली' को लिखने के लिए 'ओल चिकी' (Ol Chiki) लिपि का प्रयोग करते हैं। इस महान लिपि का आविष्कार पंडित रघुनाथ मुर्मू (Pt. Raghunath Murmu) जी ने 1925 में किया था। (92वें संविधान संशोधन, 2003 द्वारा संथाली को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया है)।
  • विवाह (बापला / Bapla): संथाल समाज में विवाह को 'बापला' कहा जाता है। इनमें कई प्रकार के विवाह होते हैं (जैसे- किरिंग बापला, सांगा बापला, इतुत बापला)। सबसे श्रेष्ठ विवाह 'किरिंग बापला' (तय विवाह) माना जाता है। विवाह के समय वर पक्ष द्वारा दिए जाने वाले वधूमूल्य को 'पोन' (Pon) या 'पोन टका' कहा जाता है।
  • प्रमुख त्योहार (सोहराय और बाहा): इनका सबसे बड़ा त्योहार 'सोहराय' (Sohrai) है, जो दीपावली के समय नई फसल कटने और पशुओं की पूजा के लिए मनाया जाता है। इसके अलावा 'बाहा' (Baha) बसंत ऋतु का (फूलों का) सबसे पवित्र त्योहार है। एरोक, करमा और सकरत इनके अन्य प्रमुख त्योहार हैं।

संथाल जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)

प्रश्न: संथाल जनजाति की अपनी भाषा 'संथाली' की लिपि का क्या नाम है और इसका आविष्कार किसने किया था?
उत्तर: संथाली भाषा की लिपि का नाम 'ओल चिकी' (Ol Chiki) है, जिसका आविष्कार महान विद्वान पंडित रघुनाथ मुर्मू (Pt. Raghunath Murmu) ने 1925 में किया था।
प्रश्न: संथाल समाज में सामाजिक नियमों के उल्लंघन (जैसे समगोत्रीय विवाह) पर दी जाने वाली सबसे कठोर सजा क्या है?
उत्तर: संथाल समाज की सबसे कठोर सजा 'बिटलाहा' (Bitlaha) है, जो एक प्रकार का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) है, जिसमें व्यक्ति को समाज से हमेशा के लिए निकाल दिया जाता है।
प्रश्न: 1855 ई. में हुए ऐतिहासिक 'संथाल हूल' (संथाल विद्रोह) का नेतृत्व किन्होंने किया था?
उत्तर: अंग्रेजों और महाजनों के शोषण के खिलाफ हुए इस महाविद्रोह का नेतृत्व चार भाइयों— सिदो (Sidhu), कान्हू (Kanhu), चांद और भैरव ने किया था।
प्रश्न: संथाल समाज में गांव के मुखिया और धार्मिक पुजारी को क्रमशः क्या कहा जाता है?
उत्तर: संथाल समाज में गांव के प्रशासनिक मुखिया को 'मांझी' (Manjhi) और पारंपरिक धार्मिक पुजारी को 'नायके' (Naeke) कहा जाता है।
प्रश्न: संथाल जनजाति के सर्वोच्च देवता कौन हैं और इनके पवित्र पूजा स्थल को क्या कहते हैं?
उत्तर: संथालों के सर्वोच्च देवता 'मरांग बुरु' (Marang Buru) या 'ठाकुर जीउ' हैं, और गांव में साल के पेड़ों से घिरे इनके पवित्र पूजा स्थल को 'जाहेर थान' (Jaher Than) कहा जाता है।
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