कमार जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Kamaar Tribe in Hindi

इस पोस्ट में कमार जनजाति (Kamar Tribe in Hindi) के बारे में, उनके इतिहास, रहन-सहन, संस्कृति, भाषा एवं बोली, विवाह प्रथा, कृषि एवं खान-पान, रीति-रिवाज, त्योहार एवं देवी-देवताओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी गई है। यह जनजाति छत्तीसगढ़ की सबसे विशेष और आदिम जनजातियों में से एक है।

Kamar Tribe Overview (कमार जनजाति एक नजर में)
जनजाति का नाम कमार जनजाति (भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष पिछड़ी जनजाति - PVTG)
प्रमुख उपजातियां मंकड़िया (बंदर खाने वाले) और पहाड़पती (पहाड़ों पर रहने वाले)
प्रमुख गोत्र (टोटम) नेताम (कछुआ), मरकाम, कुंजाम, जगत, सोढ़ी, छेडइहा और वांजम आदि।
निवास स्थान मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले (बिन्द्रानवागढ़, मैनपुर, छुरा) और धमतरी (मगरलोड, नगरी)।
भाषा एवं बोली कमारी बोली और छत्तीसगढ़ी
पारंपरिक व्यवसाय बांस शिल्प (Bamboo Craft) अत्यंत उत्कृष्ट स्तर का

कमार जनजाति (Kamar Janjati) - कमार जनजाति भारत सरकार द्वारा घोषित 75 'विशेष पिछड़ी जनजातियों' (PVTGs) में से एक है। छत्तीसगढ़ में केंद्र सरकार द्वारा घोषित 5 पिछड़ी जनजातियों में कमार का प्रमुख स्थान है। यह जनजाति मुख्य रूप से गरियाबंद और धमतरी जिलों के घने जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है। कमार लोग स्वयं को प्रकृति का सच्चा पुत्र मानते हैं और अपनी आदिम परंपराओं को आज भी बहुत सख्ती से निभाते हैं। विकास अभिकरण के माध्यम से सरकार इनके संरक्षण का लगातार प्रयास कर रही है।

कमार जनजाति का इतिहास और उत्पत्ति (History of Kamar Tribe)

कमार जनजाति की उत्पत्ति के लिखित ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं हैं, लेकिन इनकी जनश्रुतियों के अनुसार इनकी उत्पत्ति 'वामन देवता' से मानी जाती है। गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र में स्थित 'देवडोंगर' गाँव को ये अपना आदि-स्थान और पवित्र तीर्थ मानते हैं। इसी देवडोंगर में इनके प्रमुख देवता वामन देव का वास माना जाता है। जंगलों और पहाड़ों के किनारे बसे होने के कारण इन्हें पहड़िया भी कहा जाता है।

कमार जनजाति की विशेष वर्जनाएं (Strict Taboos & Traditions)

कमार जनजाति अपनी कुछ अत्यंत कठोर और अनोखी परंपराओं (Taboos) के लिए पूरे भारत में जानी जाती है:

  • घोड़ा छूना पाप (Horse Touch Taboo): कमार जनजाति में घोड़े को छूना महापाप माना जाता है। यदि कोई गलती से भी घोड़े को छू ले, तो उसे समाज से बाहर कर दिया जाता है और प्रायश्चित्त करने पर ही वापस लिया जाता है।
  • बाल न कटवाना: इस जनजाति के पुरुष पारंपरिक रूप से अपने सिर के बाल नहीं कटवाते हैं।
  • नाक नहीं छिदवाना: कमार महिलाएं कभी भी अपनी नाक नहीं छिदवाती हैं, यह इनकी संस्कृति के विरुद्ध माना जाता है।
  • घर का त्याग: यदि परिवार के किसी सदस्य की घर के भीतर मृत्यु हो जाती है, तो ये उस घर (झोपड़ी) का हमेशा के लिए त्याग कर देते हैं और नई जगह पर नया घर बनाते हैं।

कृषि और अर्थव्यवस्था (Agriculture & Bamboo Craft)

कमार जनजाति की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से बांस शिल्प (Bamboo Craft) और जंगलों पर निर्भर है:

  • बांस शिल्प: कमार लोग छत्तीसगढ़ की जनजातियों में सबसे उत्कृष्ट बांस शिल्पी माने जाते हैं। ये बांस से सूपा, टुकनी, टोकरा और कलात्मक वस्तुएं बनाकर हाट-बाजारों में बेचते हैं, जो इनकी आय का मुख्य साधन है।
  • स्थानांतरित कृषि ('दहिया'): पारंपरिक रूप से ये लोग जंगलों को जलाकर स्थानांतरित कृषि करते थे, जिसे इनकी भाषा में 'दहिया' (Dahia) कहा जाता है। (हालांकि अब सरकार ने वन संरक्षण के लिए इस पर रोक लगा दी है)।
  • शिकार एवं वनोपज: ये लोग तीर-धनुष से शिकार करने में माहिर होते हैं और जंगलों से महुआ, चार, तेंदूपत्ता, डोरी (महुआ फल) इकट्ठा करते हैं।

स्थानीय पंचायत (Traditional Panchayat - Kurha)

कमार समाज में आपसी विवादों को सुलझाने के लिए इनकी अपनी एक बहुत मजबूत जातीय पंचायत होती है। इस पंचायत के प्रमुख (मुखिया) को 'कुरहा' (Kurha) कहा जाता है। कुरहा का पद समाज में अत्यंत सम्मानजनक होता है और उसका फैसला सभी को मानना पड़ता है।

त्योहार एवं लोकगीत (Festivals & Folk Songs)

कमार जनजाति के लोग नवाखाई, हरेली, पोला, माटीजात्रा, दशहरा और दीपावली धूमधाम से मनाते हैं। नई फसल आने पर 'नवाखाई' विशेष रूप से मनाया जाता है।

दीपावली के अवसर पर महिलाएं सुआ नृत्य करती हैं। इसके अलावा जश गीत (माता सेवा गीत), करमा, और बिहाव गीत इनके प्रमुख लोकगीत हैं। (नोट: घोटुल पाटा और धनकुल इनके गीत नहीं हैं)।

कमारों का प्रसिद्ध जश गीत:
मइया पचरंग सहज सिंगार हो माय
सेते ककनिया सेते बनुरिया, सेते पटा तुम्हारी हो माय
सेते हे तोर बांह बहुंटिया सेत धजा फहराई...

कमार जनजातियों के देवी-देवता (Deities of Kamar Tribe)

कमार जनजाति का मुख्य धार्मिक स्थान 'देवडोंगर' है। इनके सर्वप्रमुख देवता 'वामन देव' हैं। इसके अलावा ये छोटेमाई-बड़ेमाई (जिन्हें ये देवडोंगर में पूजते हैं), शीतला माता, ठाकुरदेव, धरती माता, और अपने पूर्वजों (डूमा देव / पोगरी देवता) की पूजा करते हैं। ये लोग जादू-टोने और तंत्र-मंत्र में भी बहुत विश्वास रखते हैं।

विवाह संस्कार (Wedding Ceremony)

कमार जनजाति में समगोत्रीय विवाह पूर्णतः वर्जित है। समाज में निम्नलिखित विवाह प्रथाएं मान्य हैं:

  • सुखधन (क्रय विवाह): विवाह तय होने पर वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को सुखधन (वधूमूल्य) दिया जाता है।
  • घरजिया (सेवा विवाह): जब लड़का ससुर के घर जाकर सेवा करता है।
  • पैठू (हठ विवाह): जब लड़की अपनी मर्जी से लड़के के घर जाकर रहने लगे।
  • गुरावट: विनिमय विवाह (लड़के-लड़कियों का आदान-प्रदान)।
  • विधवा पुनर्विवाह और 'चूड़ी पहनाना' भी इस समाज में मान्य है।

कमार जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: कमार जनजाति की पारंपरिक पंचायत के मुखिया को क्या कहा जाता है?
उत्तर: 'कुरहा' (Kurha)।
प्रश्न: किस जनजाति में घोड़े को छूना (अश्व स्पर्श) पूर्णतः वर्जित और पाप माना जाता है?
उत्तर: कमार जनजाति में। ऐसा करने पर व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
प्रश्न: कमार जनजाति द्वारा की जाने वाली स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) को क्या कहते हैं?
उत्तर: 'दहिया' (Dahia)।
प्रश्न: कौन सी जनजाति परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाने पर उस घर का त्याग कर देती है?
उत्तर: कमार जनजाति। वे मृत्यु वाले घर को छोड़कर नई जगह पर झोपड़ी बनाते हैं।
प्रश्न: बांस शिल्प (Bamboo Craft) में छत्तीसगढ़ की सबसे निपुण जनजाति किसे माना जाता है?
उत्तर: कमार जनजाति को।
Next Post Previous Post
No Comment
Add Comment
comment url