भतरा जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Bhatra Tribe in Hindi

इस पोस्ट में भतरा जनजाति (Bhatra Tribe in Hindi) के बारे में, उनके इतिहास, रहन-सहन, संस्कृति, भाषा एवं बोली, विवाह प्रथा, कृषि एवं खान-पान, रीति-रिवाज, त्योहार एवं देवी-देवताओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी गई है।

Bhatra Tribe Overview (भतरा जनजाति एक नजर में)
जनजाति का नाम भतरा जनजाति
शाब्दिक अर्थ सेवक या परिचारक (Servant)
प्रमुख उपजातियां अमनैत (सबसे उच्च), पीत (मध्यम), और सान भतरा (सबसे निम्न)
प्रमुख गोत्र (टोटम) कश्यप, नाग, बघेल, कुकुर, बाघ, बकरी आदि।
निवास स्थान मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग (बस्तर, कोंडागांव, सुकमा), ओडिशा और महाराष्ट्र।
भाषा एवं बोली भतरी बोली (ओड़िया, हल्बी और छत्तीसगढ़ी का मिश्रण - इंडो-आर्यन भाषा परिवार)
प्रमुख लोक कला 'भतरा नाट' (पारंपरिक लोकनाट्य)

भतरा जनजाति (Bhatra Janjati) - भतरा जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग तथा ओडिशा के सीमांत क्षेत्रों में निवास करने वाली एक प्रमुख और शांतिप्रिय जनजाति है। 'भतरा' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'सेवक' (Sewak) या 'परिचारक' होता है। इतिहास में ये बस्तर के राजाओं के यहाँ सैनिक और सेवक के रूप में कार्य करते थे। अन्य जनजातियों की तुलना में ये हिंदू धर्म और उसकी मान्यताओं के काफी करीब माने जाते हैं।

भतरा जनजाति का इतिहास एवं उत्पत्ति (History & Origin)

भतरा जनजाति के बस्तर आगमन को लेकर ऐतिहासिक और जनश्रुति आधारित दो प्रमुख मान्यताएं हैं:

  • काकतीय वंश के साथ आगमन: अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि 14वीं शताब्दी में जब काकतीय वंश के संस्थापक राजा अन्नम देव वारंगल (तेलंगाना) से बस्तर आए थे, तब भतरा जनजाति के लोग उनके साथ सेवक और सैनिक के रूप में बस्तर आए और यहीं बस गए।
  • रथ यात्रा से संबंध: एक अन्य किंवदंती के अनुसार, बस्तर के प्रसिद्ध राजा पुरुषोत्तम देव जब जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) की यात्रा से लौटे थे, तब वे अपने साथ कुछ भद्र (सभ्य) लोगों को लेकर आए थे, जिन्हें जनेऊ पहनाया गया था। कालांतर में यही 'भद्र' शब्द अपभ्रंश होकर 'भतरा' बन गया।

उपजातियों का सामाजिक पदानुक्रम (Hierarchy of Sub-tribes)

भतरा समाज को शुद्धता और उत्पत्ति के आधार पर तीन प्रमुख उपजातियों (वर्गों) में बांटा गया है, जिनमें उच्च-नीच का भेद पाया जाता है:

  1. अमनैत भतरा: इन्हें सबसे शुद्ध और उच्च वर्ग का माना जाता है। ये केवल अपने ही समूह में वैवाहिक संबंध बनाते हैं।
  2. पीत भतरा: ये मध्यम दर्जे के माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इनकी उत्पत्ति भतरा और अन्य समान दर्जे की जनजातियों के वैवाहिक संबंधों से हुई है।
  3. सान भतरा: इन्हें समाज में सबसे निम्न दर्जा प्राप्त है।

भाषा एवं बोली (Language)

भतरा जनजाति के लोग 'भतरी' बोली बोलते हैं। भतरी बोली पर ओड़िया भाषा का बहुत गहरा प्रभाव है। यह मुख्य रूप से ओड़िया, हल्बी और छत्तीसगढ़ी का एक सुंदर मिश्रण है, जो बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्रों में संपर्क भाषा का कार्य भी करती है।

पारंपरिक लोक कला - 'भतरा नाट' (Bhatra Naat)

भतरा जनजाति की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध पहचान इनका पारंपरिक लोकनाट्य है, जिसे 'भतरा नाट' कहा जाता है। यह एक प्रकार का थिएटर या नाटक है जिसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • इस नाट्य की विषयवस्तु मुख्य रूप से रामायण, महाभारत और पौराणिक कथाओं पर आधारित होती है।
  • इस लोकनाट्य में केवल पुरुष ही भाग लेते हैं (महिलाओं की भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं)।
  • इसमें युद्ध और वीरता के दृश्यों को बहुत ही कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

रहन-सहन और 'चापड़ा' का उपयोग (Lifestyle & Chaprah Chutney)

भतरा लोग मुख्य रूप से खेती और वनोपज पर निर्भर हैं। इनका मुख्य भोजन चावल (भात), पेज और जंगली भाजियां हैं。

लाल चींटी का प्रयोग (चापड़ा): बस्तर की अन्य जनजातियों की तरह भतरा जनजाति भी साल (SaaL) के पेड़ों पर पाई जाने वाली लाल चींटियों (Red Ants) को पीसकर उसकी चटनी बनाती है, जिसे स्थानीय भाषा में 'चापड़ा' कहा जाता है। इन चींटियों में फॉर्मिक एसिड होता है। मान्यता है कि यह चटनी सर्दी, जुकाम और मलेरिया जैसी बीमारियों से बचाती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।

देवी-देवता और धार्मिक जीवन (Deities & Religion)

भतरा जनजाति हिंदू देवी-देवताओं के साथ-साथ अपनी स्थानीय ग्राम देवियों की बहुत आस्था से पूजा करती है। इनके प्रमुख देवी-देवता निम्नलिखित हैं:

  • माटी देव: खेती और अच्छी फसल के देवता।
  • भैरम देव: (पुलट भैरम, जेना भैरम आदि) जो गांव की रक्षा करते हैं।
  • बंजारी माता और शीतला माता: बीमारियों और महामारियों से बचाने वाली देवियां।
  • शिकार देव: शिकार पर जाने से पहले इनकी पूजा की जाती है।

समाज में झाड़-फूंक और पूजा कराने वाले बैगा को 'सिरहा' या 'पुजारी' कहा जाता है।

विवाह संस्कार और 'दाड़' प्रथा (Wedding & 'Daad' Custom)

इनमें समगोत्रीय विवाह वर्जित है। ममेरे-फुफेरे भाई-बहनों में विवाह (Cross-cousin marriage) को श्रेष्ठ माना जाता है。

दाड़ (जुर्माना) प्रथा: भतरा जनजाति अपने जातीय नियमों को लेकर बहुत सख्त है। यदि कोई भतरा पुरुष या महिला अपनी जाति से बाहर किसी अन्य निम्न या दूसरी जनजाति के व्यक्ति से विवाह कर ले, तो उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। समाज में वापसी के लिए उसे पंचायत को भारी जुर्माना देना पड़ता है और पूरे गांव को भोज कराना पड़ता है। इस प्रथा को 'दाड़' (Daad) कहा जाता है।

भतरा जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)

प्रश्न: भतरा शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर: भतरा शब्द का अर्थ 'सेवक' या परिचारक होता है। ये बस्तर के राजाओं के यहाँ सेवक का कार्य करते थे।
प्रश्न: भतरा जनजाति की सबसे उच्च उपजाति कौन सी है?
उत्तर: अमनैत भतरा। इन्हें समाज में सबसे शुद्ध और उच्च वर्ग का माना जाता है।
प्रश्न: 'भतरा नाट' क्या है?
उत्तर: यह भतरा जनजाति का एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनाट्य है, जो महाभारत और पौराणिक कथाओं पर आधारित होता है और इसमें केवल पुरुष कलाकार ही भाग लेते हैं।
प्रश्न: भतरा जनजाति किसके साथ बस्तर आई थी?
उत्तर: ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, भतरा जनजाति 14वीं शताब्दी में काकतीय राजा अन्नम देव के साथ वारंगल से बस्तर आई थी।
प्रश्न: भतरा जनजाति में 'दाड़' प्रथा क्या है?
उत्तर: अंतर्जातीय विवाह करने या सामाजिक नियम तोड़ने पर समाज (पंचायत) द्वारा लगाया जाने वाला जुर्माना 'दाड़' कहलाता है।
Next Post Previous Post
No Comment
Add Comment
comment url