धनवार जनजाति: इतिहास, संस्कृति और रहन-सहन | Dhanwar Tribe in Hindi

इस पोस्ट में धनवार जनजाति (Dhanwar Tribe in Hindi) के बारे में, उनके इतिहास, रहन-सहन, संस्कृति, भाषा एवं बोली, विवाह प्रथा, कृषि एवं खान-पान, रीति-रिवाज, त्योहार एवं देवी-देवताओं के बारे में प्रामाणिक जानकारी दी गई है।

Dhanwar Tribe Overview (धनवार जनजाति एक नजर में)
जनजाति का नाम धनवार या धनुहार जनजाति
उत्पत्ति और नामकरण 'धनुष-बाण' (Bow and Arrow) धारण करने और बनाने के कारण।
प्रमुख गोत्र (टोटम) कुमरा, मरई, उइके, उर्रे, सोनवानी, बाघ (बाघवा), और हनुमान आदि।
निवास स्थान मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के मध्य और उत्तरी जिले: बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़, सरगुजा, और जशपुर।
भाषा एवं बोली धनवारी, सादरी और छत्तीसगढ़ी (इंडो-आर्यन भाषा परिवार)
पारंपरिक पंचायत प्रमुख 'धनिया' (Dhania)

धनवार जनजाति (Dhanwar Janjati) - धनवार जनजाति छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य और उत्तरी भागों में निवास करने वाली एक अत्यंत स्वाभिमानी और परिश्रमी जनजाति है। इन्हें 'धनुहार' के नाम से भी जाना जाता है। सदियों से जंगलों और पहाड़ों के बीच रहते हुए इस जनजाति ने अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान बनाई है। यह जनजाति मुख्य रूप से अपनी तीरंदाजी (Archery) और बांस शिल्प कला के लिए जानी जाती है。

धनवार जनजाति का इतिहास एवं उत्पत्ति (History & Origin)

धनवार जनजाति का इतिहास उनके नाम में ही छिपा है। 'धनवार' शब्द की उत्पत्ति 'धनुष' (Bow) से हुई है। जनश्रुतियों और लोक-मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में जब आजीविका और सुरक्षा का मुख्य साधन शिकार हुआ करता था, तब इस जनजाति के लोगों ने धनुष-बाण बनाने और उसे चलाने में अद्वितीय महारत हासिल की थी। हमेशा अपने साथ धनुष-बाण धारण करने और इसके निर्माण कला में निपुण होने के कारण ही इन्हें 'धनुहार' या 'धनवार' कहा जाने लगा। ये लोग आज भी धनुष-बाण को अपना इष्ट मानते हैं और इसकी पूजा करते हैं。

भाषा एवं बोली (Language)

धनवार जनजाति की अपनी स्थानीय बोली 'धनवारी' है, जिस पर छत्तीसगढ़ी और सरगुजिया बोली का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। बाहरी लोगों से संपर्क करने के लिए ये मुख्य रूप से ठेठ छत्तीसगढ़ी और सादरी भाषा का प्रयोग करते हैं。

रहन-सहन, खान-पान और पहनावा (Lifestyle & Food Habits)

रहन-सहन: धनवार जनजाति के लोग मुख्य रूप से गांवों में निवास करते हैं। इनके घर मिट्टी और लकड़ी के बने होते हैं, जिनकी छतों पर खपरैल या घास-फूस का छप्पर होता है। घरों को गोबर और छुही (सफेद मिट्टी) से लीपा जाता है。

खान-पान: इनका मुख्य भोजन चावल (भात), बासी, पेज (चावल या कोदो का तरल रूप) और जंगली कंद-मूल है। ये लोग शिकार के शौकीन होते हैं, इसलिए इनके भोजन में मांस भी शामिल होता है। उत्सवों और त्योहारों पर महुआ से बनी शराब और चावल से बनी 'हड़िया' का सेवन समाज में एक आम परंपरा है。

पहनावा एवं आभूषण: पुरुष पारंपरिक रूप से धोती और गमछा पहनते हैं, जबकि महिलाएं 'लुगरा' (साड़ी) पहनती हैं। महिलाओं में गोदना (Tattoo) गुदवाने की बहुत गहरी परंपरा है और वे गिलट, चांदी व मोतियों के पारंपरिक आभूषण (जैसे ऐंठी, पहुंची, करधन) पहनती हैं。

पारंपरिक व्यवसाय एवं कृषि (Traditional Occupation & Agriculture)

धनवार जनजाति की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, बांस शिल्प और वनोपज पर निर्भर है:

  • धनुष और बांस शिल्प: प्राचीन काल में इनका मुख्य पेशा धनुष-बाण बनाना था। वर्तमान में ये लोग बांस से अत्यंत सुंदर और उपयोगी वस्तुएं (जैसे- सूपा, टुकनी, चटाई) बनाते हैं और उन्हें हाट-बाजारों में बेचते हैं।
  • कृषि: ये लोग मैदानी और ढलान वाले क्षेत्रों में स्थायी कृषि करते हैं। मुख्य रूप से धान, मक्का, कोदो-कुटकी, और उड़द की खेती की जाती है।
  • वनोपज: जंगलों से महुआ, चार (चिरौंजी), तेंदूपत्ता और साल के बीज इकट्ठा करना इनकी आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

प्रमुख देवी-देवता एवं धार्मिक आस्था (Deities of Dhanwar Tribe)

धनवार जनजाति प्रकृति पूजक (Animist) है। इनके प्रमुख देवी-देवता निम्नलिखित हैं:

  • ठाकुर देव: गांव के रक्षक देवता, जिनकी पूजा गांव की सुख-शांति और अच्छी फसल के लिए की जाती है।
  • दूल्हा देव: बीमारियों और संकटों से रक्षा करने वाले देवता।
  • माई / धरती माता: जीवन और अन्न देने वाली देवी के रूप में पूजनीय हैं।

धनवार जनजाति में जादू-टोने और तंत्र-मंत्र का भी प्रभाव देखने को मिलता है। इनके धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने वाले पुजारी को 'बैगा' कहा जाता है。

त्योहार एवं लोकनृत्य (Festivals & Folk Dances)

धनवार जनजाति के लोग छत्तीसगढ़ के स्थानीय त्योहारों को अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं:

  • त्योहार: हरेली (कृषि उपकरणों की पूजा), नवाखाई (नई फसल आने पर), पोला, छेरछेरा, और दीपावली इनके प्रमुख त्योहार हैं।
  • लोकनृत्य: कर्मा पूजा के अवसर पर युवक-युवतियां मिलकर 'करमा नृत्य' करते हैं। दीपावली के अवसर पर महिलाएं 'सुआ नृत्य' करती हैं। विवाह और उत्सवों पर 'ददरिया' और 'बिहाव गीत' गाए जाते हैं।

विवाह संस्कार और पारंपरिक पंचायत (Wedding Ceremony & Panchayat)

धनवार जनजाति में समगोत्रीय विवाह (एक ही गोत्र में विवाह) पूर्णतः वर्जित होता है। विवाह की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • समाज में आयोजित विवाह (क्रय विवाह) सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। इसमें वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को सम्मान स्वरूप चावल, दाल, गुड़, हल्दी, तेल, वस्त्र और कुछ नकद राशि दी जाती है, जिसे 'सुक भरना' (वधूमूल्य) कहा जाता है।
  • इसके अलावा समाज में लमसेना (सेवा विवाह), ढुकू (घुसपैठ विवाह), और उढ़रिया (सहपलायन) विवाह भी मान्य है। विधवा पुनर्विवाह को 'चूड़ी पहनाना' कहा जाता है।

पारंपरिक पंचायत और 'धनिया': धनवार समाज में आपसी विवादों (विशेषकर वैवाहिक और सामाजिक नियमों के उल्लंघन) को सुलझाने के लिए एक बहुत मजबूत पारंपरिक 'जाति पंचायत' होती है। इस पंचायत के मुखिया को 'धनिया' (Dhania) कहा जाता है। 'धनिया' का पद आमतौर पर वंशानुगत होता है और उसका फैसला समाज के हर व्यक्ति को मानना पड़ता है。

धनवार जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)

प्रश्न: धनवार जनजाति का नामकरण किस आधार पर हुआ है?
उत्तर: 'धनुष-बाण' धारण करने और उनके निर्माण में विशेषज्ञ होने के कारण इन्हें 'धनुहार' या 'धनवार' कहा जाता है।
प्रश्न: धनवार जनजाति की पारंपरिक जाति पंचायत के मुखिया को क्या कहा जाता है?
उत्तर: पारंपरिक पंचायत के मुखिया को 'धनिया' (Dhania) कहा जाता है। (यह प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है)।
प्रश्न: धनवार जनजाति मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के किन जिलों में पाई जाती है?
उत्तर: मुख्य रूप से बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़, सरगुजा और जशपुर जिलों में।
प्रश्न: धनवार जनजाति में विवाह के समय वर पक्ष द्वारा दिए जाने वाले वधूमूल्य को क्या कहते हैं?
उत्तर: 'सुक' या 'सुक भरना' कहा जाता है, जिसमें राशन और नकद राशि शामिल होती है।
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