महली जनजाति: इतिहास, बांस शिल्प, उपवर्ग, संस्कृति और समाज | Mahli Tribe in Hindi
इस पोस्ट में मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में निवास करने वाली, ऐतिहासिक रूप से जनजातीय समाज की पारंपरिक बांस शिल्पी मानी जाने वाली अत्यंत कला-प्रेमी महली जनजाति के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई है। इसमें उनके इतिहास, बांसफोड़ से लेकर महली मुंडा तक उनके 5 प्रमुख उपवर्गों, टोकरी व सूप बनाने के उनके पुश्तैनी कौशल, टोटेमिक गोत्र (किल्ली) व्यवस्था, और सर्वोच्च देवी 'सुरजी देवी' तथा उनके धार्मिक पुजारी 'पाहन' का गहराई से कथात्मक वर्णन किया गया है।
| Mahli Tribe Overview (महली जनजाति एक नजर में) | |
|---|---|
| जनजाति का नाम | महली (Mahli) |
| प्रजातीय समूह | प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड (Proto-Australoid) प्रजातीय समूह। |
| मुख्य निवास स्थान | मुख्यतः झारखंड (रांची, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, सिंहभूम), पश्चिम बंगाल और ओडिशा। |
| प्रमुख उपवर्ग | बांसफोड़, पातर, सुलुखी, तांती, और महली मुंडा। |
| भाषा एवं बोली | महली बोली (मुंडारी/संथाली से मिलती-जुलती), सादरी, खोरठा और क्षेत्रीय हिंदी। |
| पारंपरिक व्यवसाय | बांस का शिल्प (Bamboo Craft), टोकरी और सूप बनाना, कृषि तथा मजदूरी। |
| धार्मिक पुजारी | पाहन (Pahan) या नाय (Naia)। |
महली जनजाति (Mahli Janjati) - महली छोटानागपुर पठार और पूर्वी भारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण, परिश्रमी और शिल्पी (Artisan) अनुसूचित जनजाति (ST) है। जनजातीय समाज के ग्रामीण ढांचे में महली समुदाय का स्थान बिल्कुल वैसा ही है जैसा लौहकर्म के लिए करमाली या लोहरा का है। ये लोग बांस (Bamboo) के काम में इतने निपुण होते हैं कि इन्हें छोटानागपुर का 'पारंपरिक बांस शिल्पी' कहा जाता है। मुंडा, उरांव और संथाल किसानों को अनाज रखने और फटकने के लिए टोकरी, सूप और अन्य बांस के उपकरण महली समुदाय ही सदियों से उपलब्ध कराता आ रहा है।
1. इतिहास, उत्पत्ति और मुंडा-संथाल से संबंध (History & Origin)
महली जनजाति का इतिहास उनके शिल्प कौशल और जनजातीय पारिस्थितिकी (Tribal Ecology) से गहराई से जुड़ा हुआ है:
- उत्पत्ति और प्रजाति: मानवशास्त्रियों (जैसे एच.एच. रिजले) के अनुसार, महली जनजाति प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड प्रजातीय समूह से संबंधित है। इनकी शारीरिक बनावट, भाषा और संस्कृति मुंडा और संथाल जनजातियों से इतनी अधिक मिलती-जुलती है कि इन्हें मूल रूप से मुंडा या संथालों की ही एक ऐसी शाखा माना जाता है जो कालांतर में बांस का काम करने के कारण एक स्वतंत्र जनजाति बन गई।
- 'महली' शब्द का अर्थ: महली शब्द की उत्पत्ति संभवतः मुंडारी भाषा के शब्दों से हुई है जिसका संबंध शिल्प या कारीगरी से है। गांव की अर्थव्यवस्था में ये बांस के कारीगरों के रूप में जाने जाते हैं।
- भाषा (महली और सादरी): इनकी अपनी बोली 'महली' है जो मुंडारी और संथाली भाषा परिवार (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) का ही एक रूप है। हालांकि, संपर्क भाषा के रूप में ये सादरी (Sadri), खोरठा और कुड़माली का सबसे अधिक प्रयोग करते हैं।
2. सामाजिक संरचना: महली समाज के 5 प्रमुख उपवर्ग (Sub-divisions)
महली समाज अपने व्यवसाय और सामाजिक रीति-रिवाजों के आधार पर पांच स्पष्ट उपवर्गों में विभाजित है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
- 1. बांसफोड़ महली (Bansphor Mahli): यह महली समाज का सबसे प्रमुख वर्ग है, जो मुख्य रूप से बांस काटने, उसे फाड़ने और उससे टोकरियां व सूप बनाने का पुश्तैनी कार्य करता है।
- 2. पातर महली (Patar Mahli): यह वर्ग मुख्य रूप से खेती (कृषि) करता है और साथ ही बांस के काम में भी निपुण होता है।
- 3. सुलुखी महली (Sulukhi Mahli): यह वर्ग खेती करने के साथ-साथ दैनिक मजदूरी (Labor) का काम भी करता है।
- 4. तांती महली (Tanti Mahli): 'तांती' का अर्थ बुनकर होता है, लेकिन यह वर्ग मुख्य रूप से पालकी ढोने (Palanquin bearers) और कपड़े बुनने का कार्य करता था।
- 5. महली मुंडा (Mahli Munda): यह वर्ग मुंडा जनजाति के सबसे करीब है और इनकी संस्कृति तथा रीति-रिवाज मुंडा समाज से बहुत अधिक मेल खाते हैं।
3. आर्थिक जीवन: पारंपरिक बांस शिल्प और कृषि (Economy & Bamboo Craft)
महली जनजाति का आर्थिक जीवन शारीरिक श्रम और उंगलियों के अद्भुत हुनर का प्रतीक है:
- पारंपरिक बांस शिल्प (Bamboo Craftsmanship): महली लोग बांस को छीलकर और गूंथकर अत्यंत सुंदर और उपयोगी वस्तुएं बनाने में माहिर होते हैं। ये किसानों के लिए अनाज फटकने का सूप (Soop), टोकरी (Tokri), दउरा (Daura - बड़ी टोकरी), कुमनी (मछली पकड़ने का जाल) और छतरियां बनाते हैं। इन वस्तुओं को स्थानीय हाट-बाजारों में बेचकर ये अपना जीवन यापन करते हैं।
- बार्टर सिस्टम (वस्तु विनिमय): अतीत में (और आज भी कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में) ये सूप और टोकरी गांव के किसानों को देते हैं और बदले में फसल कटने पर किसानों से अनाज (धान) प्राप्त करते हैं।
- कृषि और मजदूरी: आधुनिक प्लास्टिक के उपकरणों के कारण बांस के सामानों की मांग घटी है। इसलिए अब महली समाज का एक बड़ा वर्ग कृषि (Agriculture) करने लगा है। जिनके पास भूमि नहीं है, वे खेतिहर या दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं।
4. गोत्र व्यवस्था और विवाह प्रथाएं (Clans & Marriage Customs)
महली समाज पितृसत्तात्मक है और इनकी पारिवारिक व्यवस्था अन्य जनजातियों जैसी ही सुदृढ़ है:
- टोटेमिक गोत्र (Gotras): महली समाज अनेक बहिर्विवाही गोत्रों (जिन्हें किल्ली कहा जाता है) में बंटा हुआ है। संथालों और उरांवों के प्रभाव के कारण इनके गोत्र उन्हीं के समान होते हैं, जैसे— हांसदा (हंस), मुर्मू (नीलगाय), तिर्की, केरकेट्टा, और डुंगडुंग। समान गोत्र में विवाह करना पूर्णतः वर्जित है।
- विवाह और 'पोन टका' (Pon Taka): समाज में मुख्य रूप से आयोजित विवाह (तय विवाह) का प्रचलन है। विवाह के समय वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को नकद राशि और कपड़े के रूप में वधूमूल्य देने की अनिवार्य प्रथा है, जिसे महली समाज में 'पोन टका' (Pon Taka) कहा जाता है।
- विधवा पुनर्विवाह: महली समाज में विधवा पुनर्विवाह और तलाकशुदा व्यक्तियों के पुनर्विवाह को पूरी सामाजिक मान्यता प्राप्त है, जिसे स्थानीय भाषा में 'सांगा' (Sanga) विवाह कहा जाता है।
5. धर्म: 'सुरजी देवी', पूर्वज पूजा और 'पाहन' (Religion & Deities)
महली जनजाति की धार्मिक आस्थाओं में प्रकृति पूजा और अपने पूर्वजों के प्रति गहरी श्रद्धा निहित है:
- सर्वोच्च आराध्य (सुरजी देवी और सिंगबोंगा): महली जनजाति की सर्वोच्च देवी 'सुरजी देवी' (Surji Devi - सूर्य की देवी) हैं। इसके साथ ही ये मुंडाओं के सर्वोच्च देवता 'सिंगबोंगा' (Singbonga) की भी ब्रह्मांड के रचयिता के रूप में पूजा करते हैं।
- बड़पहाड़ी और मनसा देवी: गांव की रक्षा के लिए ये 'बड़पहाड़ी' (पहाड़ के देवता) और सांपों से रक्षा के लिए 'मनसा देवी' की भी अत्यंत श्रद्धा से पूजा करते हैं (विशेषकर बंगाल से सटे क्षेत्रों में)।
- पूर्वज पूजा (बूढ़ा-बूढ़ी): महली समाज में अपने घर के अंदर पूर्वजों (Ancestral spirits) की पूजा करने का विशेष महत्व है, जिन्हें वे 'बूढ़ा-बूढ़ी' (Bura-Buri) कहते हैं।
- पुजारी 'पाहन' (Pahan): गांव के सभी बड़े धार्मिक अनुष्ठानों (जैसे सरहुल) को संपन्न कराने और ग्राम देवताओं को प्रसन्न करने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'पाहन' (Pahan) या 'नाय' (Naia) कहा जाता है।
- प्रमुख त्योहार: ये लोग सरहुल (Sarhul), करमा (Karma), सोहराय (पशु पूजा), नवाखानी, और टुसू पर्व (Tusu) बहुत ही धूमधाम, हड़िया के सेवन और मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य के साथ मनाते हैं।
महली जनजाति से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य (FAQs)
- प्रश्न: महली जनजाति का ऐतिहासिक और सबसे प्रमुख पारंपरिक व्यवसाय क्या है?
- उत्तर: महली जनजाति का सबसे प्रमुख पारंपरिक व्यवसाय बांस का शिल्प (Bamboo Craftsmanship) है। ये बांस को छीलकर सूप (अनाज फटकने के लिए), टोकरियां और चटाइयां बनाने में माहिर हैं।
- प्रश्न: पेशा और संस्कृति के आधार पर महली जनजाति को कितने प्रमुख उपवर्गों में बांटा गया है?
- उत्तर: महली समाज को 5 प्रमुख उपवर्गों में बांटा गया है— बांसफोड़ महली, पातर महली, सुलुखी महली, तांती महली और महली मुंडा।
- प्रश्न: महली जनजाति की सर्वोच्च देवी किसे माना जाता है?
- उत्तर: महली जनजाति अपनी सर्वोच्च देवी के रूप में 'सुरजी देवी' (Surji Devi - सूर्य की देवी) और 'सिंगबोंगा' की अत्यंत श्रद्धा से पूजा करती है।
- प्रश्न: महली समाज में गांव के धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने वाले पुजारी को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: महली समाज में गांव के पूजा-पाठ कराने वाले पारंपरिक आदिवासी पुजारी को 'पाहन' (Pahan) या 'नाय' (Naia) कहा जाता है।
- प्रश्न: महली जनजाति में विवाह के समय दिए जाने वाले वधूमूल्य (Bride Price) को क्या कहा जाता है?
- उत्तर: विवाह के समय वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष को दी जाने वाली अनिवार्य नकद राशि या वधूमूल्य को महली समाज में 'पोन टका' (Pon Taka) कहा जाता है।